आखिरकार बन ही गई महाराष्ट्र में सरकार !

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असली राजनीति की मिसाल आज सुबह देखने को मिली जब देवेंद्र फडणवीस को सीएम पद की शपथ दिलाई गई। कोई भी इस बात का अंदाजा तक नहीं लगा सकता था की महाराष्ट्र में बीजेपी एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना लेगी और किसी को कानों कान खबर तक नहीं हुई।

पूरा देश अचम्भे में पड़ गया की आखिर यह हुआ तो हुआ कैसे जहां तक कई दिनों से यह कयास लगये जा रहे थे की शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बना सकते है लगभग यह संभव ही लग रहा था। लेकिन राजनीति में भूचाल तो तब आया जब बीजेपी एनसीपी का गठबंधन महाराष्ट्र में देखने को मिला।

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राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने देवेंद्र फडणवीस को सीएम पद की शपथ दिलाई. वहीं अजित पवार ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ली, शपथ लेने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि महाराष्ट्र की जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया था. हमारे साथ लड़ी शिवसेना ने उस जनादेश को नकार कर दूसरी जगह गठबंधन बनाने का प्रयास किया. महाराष्ट्र को स्थिर शासन देने की जरूरत थी. महाराष्ट्र को स्थायी सरकार देने का फैसला करने के लिए अजित पवार को धन्यवाद।

अजित पवार ने कहा कि परिणाम दिन से लेकर आज तक कोई भी सरकार बनाने में सक्षम नहीं थी, महाराष्ट्र किसान मुद्दों सहित कई समस्याओं का सामना कर रहा था, इसलिए हमने एक स्थिर सरकार बनाने का फैसला किया।

महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और नतीजे 24 अक्टूबर को आए थे. राज्य में किसी पार्टी या गठबंधन के सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करने की वजह से राज्य में 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था. शिवसेना के मुख्यमंत्री पद की मांग को लेकर बीजेपी से 30 साल पुराना गठबंधन तोड़ने के बाद से राज्य में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया था।

काफी वक्त से महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की बैठक होने के बावजूद किसी भी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई। मुख्यमंत्री के नाम पर आखिर तक अटकले चल रही थी। हालांकि, शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत के अनुसार उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं. इससे पहले तीनों पार्टियों की बैठक से निकलने के बाद शरद पवार ने कहा था कि जहां तक मुख्यमंत्री की बात है, उस पर कोई दोराय नहीं है. उद्धव ठाकरे को ही सरकार को लीड करना चाहिए. लेकिन शनिवार सुबह महाराष्ट्र के राजनीति की तस्वीर ही बदल गई।

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महाराष्ट्र के नतीजे आने के बाद से शिवसेना मुख्यमंत्री पद पाने की जद्दोजहत में थी , मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना बीजेपी किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं थी।पार्टी ने बीजेपी से अलग होने का फैसला किया और अपने हिंदुत्व के एजेंडे को भी दरकिनार कर एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाने पर विचार किया. लेकिन बाजी ऐसी पलटी की न 50-50 फॉर्मूला काम आया और न ही मुख़्यमंत्री पद हाथ आया और बीजेपी के साथ रिश्तो में खटास आयी वो अलग। यह कहना गलत नहीं है की बीजेपी का यह दाव राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया।