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महाभारत के समय के जुए को क्या कहते थे ?

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महाभारत के समय के जुए को क्या कहते थे?

महाभारत के समय के जुए को क्या कहते थे ?

जुआ एक अति प्राचीन खेल है। भारत में जुए का खेल अक्षक्रीड़ा या अक्षद्यूत के नाम से विख्यात है। वैदिक काल में इसे द्यूत भी बोलते थे,वेद के समय से लेकर आज तक यह भारतीयों का अत्यंत लोकप्रिय खेल रहा है।जुआ का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। प्राचीन काल में यह राजा-महाराजा का खेल हुआ करता था, लोग इस खेल को सम्मान की नजर से देखते थे।

नल और युद्धिष्ठिर ने जब जुआ खेला तो नल अपने साम्राज्य और पत्‍‌नी को दाव पर लगाया था।शकुनि ने पांडवों को फंसाने के लिए जुए का आयोजन किया था जिसके चलते पांडवों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था। अंत में उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया था। महाभारत के प्रख्यात जुआड़ी शकुनि का यह कहना था कि बाजी लगाने के कारण ही जुआ लोगों में इतना बदनाम है।

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महाभारत, अर्थशास्त्र आदि ग्रंथों से पता चलता है कि जुआ सभा में खेला जाता था। स्मृति ग्रंथों में जुआ खेलने के नियमों का पूरा परिचय दिया गया है। अर्थशास्त्र के अनुसार जुआड़ी को अपने खेल के लिए राज्य को द्रव्य देना पड़ता था। बाजी लगाए गए धन का पाँच प्रतिशत राज्य को कर के रूप में प्राप्त होता था।

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पंचम शती में उज्जयिनी में इसके विपुल प्रचार की सूचना मृच्छकटिक नाटक से हमें उपलब्ध होती है।अगर बात की जाए आज के समय में तो हम सभी जानते हैं कि जुआ सामाजिक विकृति है फिर भी वर्तमान समय में जुए के प्रचलन में वृद्धि हुई है। जुए के चक्कर में पड़कर लोग अपना आर्थिक और सामाजिक क्षति कर रहे हैं।

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समाज में यह कुरीति विकराल रुप ले चुका है।। दीपावली पर जुआ खेलने का प्रचलन है पर इसका रुप बदल चुका है। जुआ कई तरह के अपराध को जन्म देता है। वरिष्ठ शिक्षक दिनेश मंडल कहते हैं कि जुआ समाज की नजर में एक गंदा खेल है। इस खेल में व्यक्ति अपना आर्थिक, सामाजिक और चारीत्रिक क्षति कर बैठता है।

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