चारा घोटाला: जमानत रद्द करने की CBI की अर्जी खारिज, लालू यादव बोले- 'हां, मैं खुश हूं'
चारा घोटाला मामले में अपनी जमानत बरकरार रहने पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने खुशी जाहिर की है। बुधवार को पटना में अपने कौटिल्य नगर आवास के बाहर पत्रकारों से बातचीत के दौरान सु
चारा घोटाला मामले में अपनी जमानत बरकरार रहने पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने खुशी जाहिर की है। बुधवार को पटना में अपने कौटिल्य नगर आवास के बाहर पत्रकारों से बातचीत के दौरान सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने बस इतना कहा, "हां, मैं खुश हूं।" इस मौके पर समर्थकों ने उनका स्वागत किया और उनके साथ सेल्फी भी ली।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के एक दिन बाद आई है, जिसमें अदालत ने उनकी जमानत रद्द करने की सीबीआई की याचिका को खारिज कर दिया था। मंगलवार को आए इस फैसले में शीर्ष अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट द्वारा दी गई राहत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला झारखंड के देवघर कोषागार से अवैध निकासी से जुड़ा है। इसी मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव को जमानत देते हुए अंतिम फैसला आने तक उनकी सजा निलंबित कर दी थी। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने हाई कोर्ट के 12 जुलाई 2019 के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सीबीआई का कहना था कि लालू प्रसाद को आधी सजा पूरी करने के आधार पर जमानत दी गई थी, लेकिन उसकी गणना सही नहीं थी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि चारा घोटाले के विभिन्न मामलों में दी गई सजाएं एक के बाद एक (क्रमवार) चलनी चाहिए। वहीं, लालू यादव की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि सजाएं एक साथ चलेंगी या अलग-अलग, इसका फैसला अपील की अंतिम सुनवाई के दौरान होना चाहिए। सिब्बल ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए लालू यादव को वही राहत दी थी, जो आधी सजा काट चुके अन्य दोषियों को मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश को लगभग सात साल हो चुके हैं, इसलिए इस स्तर पर उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने सजा निलंबन रद्द करने से इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने झारखंड हाई कोर्ट को यह निर्देश भी दिया है कि वह 2018 से लंबित लालू यादव की आपराधिक अपील का निपटारा छह महीने के भीतर करे।
इनपुट: IANS



