Advertising
Home Top stories एन. रघुरामन का कॉलम: सामाजिक संबंध भोजन और कसरत की तरह...
Advertising
<

एन. रघुरामन का कॉलम: सामाजिक संबंध भोजन और कसरत की तरह ही आपको सेहतमंद रखेंगे

0
एन. रघुरामन का कॉलम:  सामाजिक संबंध भोजन और कसरत की तरह ही आपको सेहतमंद रखेंगे

एन. रघुरामन का कॉलम: सामाजिक संबंध भोजन और कसरत की तरह ही आपको सेहतमंद रखेंगे

  • Hindi News
  • Opinion
  • N. Raghuraman’s Column: Social Connections Will Keep You Healthy, Just Like Food And Exercise.

6 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस रविवार को मुझे एक किताब की लंबी समरी पढ़ने का मौका मिला, जो मंगलवार को, यानी आज रिलीज हो रही है। उसे पढ़ते हुए मुझे अपने कुछ रिश्ते याद आ गए। मेरी परनानी 104 साल तक जिंदा रहीं। उनके बेटे, यानी मेरे नानाजी 96 साल तक जिए। उनके सबसे बड़े बेटे, मेरे मामा की उम्र भी अब 91 वर्ष है और मैं उनसे दो हफ्ते पहले ही चेन्नई में मिला। परिवार में कुछ और भाई-बहन भी हैं, जिनकी उम्र 80 के पार है। लेकिन मैं इन तीन लोगों को जानता हूं, क्योंकि इनके साथ रहा हूं और उनकी कुछ आदतें जानता हूं।

सोच रहे हैं कि आप मेरे रिश्तेदारों के बारे में भला क्यों पढ़ें, जिन्हें आप जानते ही नहीं? वो इसलिए क्योंकि एजेकिल जे. इमैनुएल, एम.डी. की किताब ‘ईट योर आइसक्रीम : सिक्स सिंपल रूल्स फॉर ए लॉन्ग एंड हेल्दी लाइफ’ में ठीक वही तौर-तरीके बताए गए हैं, जिनके जरिए उपरोक्त रिश्तेदारों ने जीवन बिताया। लंबी जिंदगी का यदि कोई नुस्खा है तो इसे जानने के लिए आपको इन लोगों की लाइफस्टाइल को पढ़ना चाहिए, जो बेहद साधारण है। विज्ञान ये तरीके जान पाता, उससे पहले ही वो लोग इन्हें जानते थे। यहां उनकी कहानी पेश है।

मेरी परनानी ने कभी अपने कदम नहीं नापे, क्योंकि वो दरवाजे के समीप रखी बेंच से कभी उठती ही नहीं थीं। मतलब, उन्होंने एक्सरसाइज नहीं की। 11 बच्चों की उन माताजी को ‘माइंडफुलनेस’ का अर्थ कभी पता ही नहीं था। लेकिन उनका सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल था। वे अखबार को फ्रंट पेज के मास्टहेड से लेकर लास्ट पेज की अंतिम लाइन तक जोर-जोर से पढ़ती थीं। हमेशा दरवाजे के बाहर बैठीं हर गांव वाले से बात करती थीं। सड़क पर चलते कुत्तों और गायों से भी। वे उन बेघर जानवरों को बुला कर खाना खिलातीं और बातें करतीं। वो जानवर भी ऐसे बैठे रहते, मानो उनके दोस्त हों।

Advertising

मेरे नानाजी इस बातूनी स्वभाव को और आगे ले गए। उन दिनों यात्रा के दौरान मैं कुछ रेस्तरां पर जाता था तो पांच ही मिनट में वे अगली टेबल पर बैठे लोगों से बातचीत का जरिया निकाल लेते। उनसे उनके काम, परिवार, शहर और उस शहर की पसंदीदा चीजों के बारे में पूछने लगते। समीप के टेबल पर कोई नहीं बैठा हो तो वे वेटर से ही बात करने लगते। दिलचस्प यह था कि लोग उनको जवाब भी देते थे।

लोगों को यह पूछताछ जैसा नहीं, बल्कि दोस्ताना व्यवहार लगता था। मुझे याद है एक बार बस यात्रा में उन्होंने एक युवा मां को यह सुझाव तक दे दिया कि उन्हें किस डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए, क्योंकि उनके बेटे के आगे के दांत निकलने वाले हैं। मुझे काफी शर्म आई, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उतरते वक्त महिला ने उन्हें धन्यवाद दिया।

शायद वे अपनी मां से भी ज्यादा जीते, लेकिन जब वे गांव का मकान छोड़कर अपने बेटे (आज 91 वर्षीय) के साथ शिफ्ट हो गए तो बाथरूम में गिर गए। इसी हादसे में उनकी मौत हो गई। वे हमेशा कहते थे कि ‘कोई बीमारी मेरे पास नहीं फटक सकती।’ शायद इसी वजह से पूरा गांव उनका दोस्त था।

बाद में कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने एक बात साबित की : जो लोग खुश रहते हैं और जिनके दोस्त होते हैं, वे बढ़ती उम्र में भी सेहतमंद रहते हैं। सामाजिक अलगाव लंबी उम्र के लिए खतरनाक है। तो दीर्घायु होने का तरीका है कि पड़ोसियों से बातें करें, किसी दोस्त को चाय पर बुलाएं, किसी टैक्सी ड्राइवर या किराने वाले से पूछें कि आपका दिन कैसा बीत रहा है या छुट्टियां कैसी रहीं। बातें करें, सोएं और फिर बात करें।

फंडा यह है कि अकेलापन महामारी है। यह रोजाना दो पैकेट सिगरेट पीने जैसा है। अपने सामाजिक संबंधों को इतना मजबूत बनाएं कि वे भोजन और कसरत की तरह काम करने लगें।

खबरें और भी हैं…

राजनीति की और खबर देखने के लिए यहाँ क्लिक करे – राजनीति
News

Advertising