लालू यादव की सरकार को जंगल राज क्यों कहा जाता था?

935
news
लालू यादव की सरकार को जंगल राज क्यों कहा जाता था?

बिहार विधानसभा के लिए जारी चुनावी दंगल में ‘जंगल राज’ एक मुद्दा बना हुआ है।नीतीश ने लालू-राबड़ी के जंगल राज के खिलाफ अभियान छेड़कर ही बीजेपी के साथ बिहार की सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रहे थे। बहरहाल, सवाल यह है कि आखिरकार लालू-राबड़ी के 15 सालों के शासन को जंगल राज का नाम क्यों दिया गया? यह जानने के लिए लालू-राबड़ी शासन के दौरान 1990 से 2005 के बिहार के हालात पर नजर डालना होगा। तो चलिए देखते हैं, लालू-राबड़ी शासन में ‘जंगल राज’ की कुछ झलकिया।दरअसल, जंगल राज से मतलब नेताओं, नौकरशाहों, व्यापारियों, अपराधियों के आपराधिक सांठगांठ से है। लालू-राबड़ी के शासन में भी ऐसे ही नेक्सस बने थे।

बिहार का चप्पा-चप्पा अपहरण, हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती, रंगदारी, भ्रष्टाचार आदि की घटनाओं से लबरेज था। विरोधियों ने तो यहां तक कह दिया कि लालू-राबड़ी के शासन में किडनैपिंग को उद्योग का दर्जा मिल गया। जब जिसे जैसे इच्छा होती थी, बेरोकटोक किसी को उठा लेता था। खासकर, डॉक्टर, इंजिनियर और बिजनसमेन अपहरणकर्ताओं के निशाने पर रहते थे। इन्हें दिनदहाड़े उठा लिया जाता था और ऐसी घटनाएं करीब-करीब रोज ही सामने आतीं। करवाए गए एक सर्वे से पता चला कि साल 1992 से 2004 तक बिहार में किडनैपिंग के 32,085 मामले सामने आए। कई मामलों में तो फिरौती की रकम लेकर भी बंधकों को मार दिया जाता था।

Lalu Nitish -

बिहार पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक, साल 2000 से 2005 की पांच साल की अवधि में 18,189 हत्याएं हुईं। इस आंकड़े को ध्यान में रखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि 15 सालों में 50 हजार से ज्यादा लोग मौत के घाट उतार दिए गए। हैरानी की बात यह है कि सिर्फ घोषित अपराधी ही मर्डर नहीं किया करते बल्कि सांसदों-विधायकों के इशारों पर भी हत्याएं होती थीं।लालू-राबड़ी के राज में बिहार जातीय हिंसा की आग में झुलस गया था। नक्सली वारदातों का जवाब देने के लिए अगड़ी जातियों और खासकर भूमिहारों ने रणबीर सेना का गठन किया।

इन दोनों संगठनों ने एक-एक बार में सैकड़ों लोगों की हत्याएं कर बिहार की धरती को रक्तरंजित कर दिया था। भोजपुर के सहार स्थित बथानी टोला नरसंहार हो या जहानाबाद के अरवल स्थित लक्ष्णपुर बाथे कांड अथवा अरवल के ही शंकरबिगहा कांड, इन नरसंहारों को कोई भुला नहीं सकता। बिहार में जातीय हिंसा का अंत 16 जून, 2000 को औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में हुए नरसंहार से माना जा सकता है। इस घटना में यादव जाति के 33 लोग मारे गए थे। रणबीर सेना की ओर से हर कार्रवाई का जवाब देने वाले नक्सलियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी।

यह भी पढे: ऐसा चमत्कारी मंदिर जो 2 बार दर्शन देकर समुद्र में हो जाता है गायब?

lalu non ffffiii -

लालू-राबड़ी के शासन में नौकरशाहों और अधिकारियों के हाथ-पांव फूले रहते थे, यह सोचकर कि ना जाने कब ट्रांसफर ऑर्डर आ जाए। कई बार तो आधी रात को ट्रांसफर ऑर्डर निकाल दिया जाता था। अधिकारी जब सुबह अखबार पढ़ते तो पता चलता कि उनका ट्रांसफर फलां जगह हो गया है। वे दौड़े-भागे अपने-अपने आका के पास पहुंचते और ट्रांसफर रुकवाने के लिए भारी नजराना पेश करते। इससे पूरा शासन-प्रशासन अस्थिर हो गया।