जापान के यासुकुनी दौरे पर भड़का उत्तर कोरिया, दी 'तबाही के तूफान' की चेतावनी
जापान के नेताओं और सांसदों द्वारा विवादित यासुकुनी युद्ध स्मारक का दौरा किए जाने पर उत्तर कोरिया ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्योंगयांग ने इसे 'नए सैन्यवाद का उन्माद' (नियो-मिलिटेरिज्म फ्रेंजी) बताते…
जापान के नेताओं और सांसदों द्वारा विवादित यासुकुनी युद्ध स्मारक का दौरा किए जाने पर उत्तर कोरिया ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्योंगयांग ने इसे 'नए सैन्यवाद का उन्माद' (नियो-मिलिटेरिज्म फ्रेंजी) बताते हुए चेतावनी दी है कि यह कदम द्वीपीय देश में 'तबाही का तूफान' लाएगा। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह विवाद 15 अगस्त को द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की वर्षगांठ के मौके पर हुए दौरे और चढ़ावे के बाद खड़ा हुआ है।
उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए में प्रकाशित एक टिप्पणी में जापानी राजनेताओं पर सैन्य महत्वाकांक्षाओं को हवा देने का आरोप लगाया गया है। विशेष रूप से, टिप्पणी में कहा गया, "अपनी हार के मौके पर जापान की तरफ से भड़काया गया नया सैन्यवादी उन्माद इस द्वीपीय देश में तबाही का तूफान लाएगा।"
क्यों विवादास्पद है यासुकुनी श्राइन?
यासुकुनी श्राइन जापान के उन लगभग 24.6 लाख लोगों को समर्पित है जो युद्ध में मारे गए थे। इसमें द्वितीय विश्व युद्ध के 14 'वर्ग-ए' युद्ध अपराधी भी शामिल हैं, जिन्हें युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था। इसी वजह से चीन और दक्षिण कोरिया जैसे पड़ोसी देश इस स्मारक पर जापानी नेताओं के दौरे को जापान के सैन्यवादी अतीत के महिमामंडन के प्रयास के रूप में देखते हैं।
किन नेताओं ने किया था दौरा?
15 अगस्त को जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने स्वयं वहां जाने के बजाय स्मारक के लिए कुछ भेंट भेजी थी। हालांकि, जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने व्यक्तिगत रूप से श्राइन का दौरा किया था। केसीएनए ने ताकाइची की "अचानक की गई उपासना" को देश में "फिर से हमले का माहौल बनाने" और "विदेशों में विस्तार की अपनी पुरानी इच्छा को पूरा करने" की योजना बताया।
दक्षिण कोरिया ने भी जताई थी आपत्ति
उत्तर कोरिया के अलावा दक्षिण कोरिया ने भी इन दौरों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए जापान से अपने युद्धकालीन इतिहास का सामना करने और अतीत के लिए वास्तविक पश्चाताप दिखाने का आग्रह किया था। गौरतलब है कि जापान अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में बदलाव की प्रक्रिया में है, जिसकी प्योंगयांग पहले भी 'नव-सैन्यवाद' कहकर आलोचना करता रहा है।
इनपुट: IANS



