सोमवार, 3 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
टेक्नोलॉजी

कोयले की खान का कचरा बनेगा 'जल-शोधक', नई रिसर्च ने जगाई प्रदूषण से निपटने की नई उम्मीद

कोयला खदानों से निकलने वाला भारी मात्रा में कचरा, जिसे 'कोल गैंग्यू' कहा जाता है, अब तक पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। लेकिन एक नई वैज्ञानिक समीक्षा ने इसे कचरे से संसाधन बनाने की…

कोयले की खान का कचरा बनेगा 'जल-शोधक', नई रिसर्च ने जगाई प्रदूषण से निपटने की नई उम्मीद
(फोटो: IANS)

कोयला खदानों से निकलने वाला भारी मात्रा में कचरा, जिसे 'कोल गैंग्यू' कहा जाता है, अब तक पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। लेकिन एक नई वैज्ञानिक समीक्षा ने इसे कचरे से संसाधन बनाने की राह दिखाई है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने पाया है कि इस बेकार समझे जाने वाले ठोस कचरे को एक शक्तिशाली उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) में बदला जा सकता है, जो औद्योगिक अपशिष्ट जल को साफ करने में क्रांति ला सकता है।

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इस अध्ययन में पाया गया है कि सही प्रक्रिया से गुज़रने के बाद कोल गैंग्यू, पेरॉक्सीमोनोसल्फेट (पीएमएस) नामक एक शक्तिशाली ऑक्सीडेंट को सक्रिय करने की क्षमता रखता है। यह सक्रिय पीएमएस पानी में मौजूद उन खतरनाक और जिद्दी कार्बनिक प्रदूषकों को भी नष्ट कर सकता है, जिन्हें पारंपरिक जल शोधन तकनीकें आसानी से साफ नहीं कर पाती हैं।

कचरे की रासायनिक क्षमता का उपयोग

कोयला खनन के दौरान निकलने वाले कोल गैंग्यू में सिलिका, एल्यूमिना और लौह युक्त खनिजों के साथ-साथ कई सूक्ष्म धातुएं भी होती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, यही इसकी खासियत है। जब इसे गर्मी देने, पीसने (ग्राइंडिंग) और रासायनिक उपचार जैसी प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है, तो इसकी संरचना बदल जाती है और यह रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए अधिक सक्रिय हो जाता है। अध्ययन के प्रमुख लेखक लिक्सिन ली ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि कोल गैंग्यू को सिर्फ एक निष्क्रिय पदार्थ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसकी अपनी खनिज संरचना का लाभ उठाया जा सकता है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

जब संसाधित कोल गैंग्यू पीएमएस को सक्रिय करता है, तो सल्फेट रेडिकल और हाइड्रॉक्सिल रेडिकल जैसे बेहद प्रतिक्रियाशील कण पैदा होते हैं। ये कण पानी में घुले जहरीले रसायनों पर हमला करके उन्हें तोड़ देते हैं और कम हानिकारक पदार्थों में बदल देते हैं। शोधकर्ताओं ने इस तकनीक के परीक्षण के लिए टेट्रासाइक्लिन एंटीबायोटिक और फिनॉलिक यौगिकों जैसे जटिल प्रदूषकों को चुना, ताकि उत्प्रेरक की प्रभावशीलता का सही आकलन किया जा सके।

भविष्य की चुनौतियां और संभावनाएं

हालांकि ये शुरुआती नतीजे काफी उत्साहजनक हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक को प्रयोगशाला से बाहर वास्तविक दुनिया में लाने के लिए अभी कई पहलुओं पर काम करना बाकी है। यह देखना ज़रूरी होगा कि यह प्रक्रिया वास्तविक औद्योगिक गंदे पानी पर कितनी कारगर है, इसकी लागत कितनी आएगी, और क्या उत्प्रेरक को बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि इन चुनौतियों से पार पा लिया गया, तो कोयला खदानों का यह कचरा जल प्रदूषण और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान पेश कर सकता है।

इनपुट: IANS

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