एक हादसा, कटा हुआ पैर और एवरेस्ट की चोटी: अरुणिमा सिन्हा के अदम्य साहस की कहानी
यह कहानी है दृढ़ निश्चय और अदम्य साहस की। एक ऐसी महिला की, जिसने एक भयावह हादसे में अपना पैर गंवा दिया, लेकिन हौसला नहीं। कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने न सिर्फ चलना सीखा, बल्कि दुनिया की सबसे ऊंची…
यह कहानी है दृढ़ निश्चय और अदम्य साहस की। एक ऐसी महिला की, जिसने एक भयावह हादसे में अपना पैर गंवा दिया, लेकिन हौसला नहीं। कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने न सिर्फ चलना सीखा, बल्कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया। हम बात कर रहे हैं भारत की पहली दिव्यांग महिला पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा की, जिनका जीवन प्रेरणा की एक मिसाल है।
समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, 20 जुलाई 1989 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में जन्मी अरुणिमा एक प्रतिभाशाली राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी थीं। लेकिन 11 अप्रैल 2011 की एक रात ने उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी। लखनऊ से दिल्ली की यात्रा के दौरान कुछ लुटेरों ने चलती ट्रेन से उन्हें बाहर फेंक दिया। इस हादसे में उनका एक पैर कट गया और दूसरे में गंभीर चोटें आईं।
ट्रेन हादसे से एवरेस्ट के शिखर तक
उस भयानक रात को याद करते हुए अरुणिमा ने एक इंटरव्यू में बताया था, "यह मेरी जिंदगी का यू-टर्न था। कुछ लोगों ने ट्रेन में लूटपाट शुरू की। मैंने अपनी सोने की चेन को बचाने की कोशिश की। हाथापाई हुई और लुटेरों ने चलती ट्रेन से उन्हें नीचे फेंक दिया।" उन्होंने बताया कि कैसे वह पूरी रात पटरियों पर पड़ी रहीं और 48 ट्रेनें उनके पास से गुज़रीं। सुबह गाँव वालों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया, जहाँ डॉक्टरों को उनका एक पैर काटना पड़ा।
इस त्रासदी के बावजूद अरुणिमा ने हार नहीं मानी। अस्पताल के बिस्तर पर ही उन्होंने पर्वतारोहण के अपने सपने को पूरा करने का संकल्प लिया। उनका मानना है, "जो आप नहीं कर सकते, उसे उस काम के आड़े न आने दें जो आप कर सकते हैं।"
बछेंद्री पाल से प्रशिक्षण और ऐतिहासिक चढ़ाई
अपने इसी जज्बे के साथ वह उत्तरकाशी में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के कैंप पहुँचीं, जहाँ उन्हें भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल ने प्रशिक्षित किया। कड़ी ट्रेनिंग और चुनौतियों का सामना करते हुए, अरुणिमा ने 52 दिनों की मुश्किल चढ़ाई के बाद 2013 में माउंट एवरेस्ट फतह किया। यह असाधारण उपलब्धि हासिल करने वाली वह पहली दिव्यांग महिला बनीं, जिसने यह साबित कर दिया कि हौसलों के आगे कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।
इनपुट: IANS



