संयुक्त राष्ट्र महासभा: अमेरिका ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति को फिर नहीं दिया वीजा, भारत ने वीडियो संबोधन का किया समर्थन
संयुक्त राष्ट्र महासभा की आगामी उच्च-स्तरीय बैठक से पहले अमेरिका ने फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को एक बार फिर वीजा देने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद, भारत ने उस प्रस्ताव के पक्ष में…
संयुक्त राष्ट्र महासभा की आगामी उच्च-स्तरीय बैठक से पहले अमेरिका ने फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को एक बार फिर वीजा देने से इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद, भारत ने उस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया है जिसके तहत अब्बास को वीडियो लिंक के माध्यम से महासभा को संबोधित करने की अनुमति दी जाएगी।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव बुधवार को भारी बहुमत से पारित हो गया। प्रस्ताव के समर्थन में 152 देशों ने वोट दिया, जबकि अमेरिका, इज़रायल और पैराग्वे ने इसका विरोध किया। चार अन्य देशों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया। यह लगातार दूसरा साल है जब राष्ट्रपति अब्बास को वीजा न मिलने के कारण वीडियो के जरिए संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करना होगा।
अमेरिका का तर्क और अन्य देशों की प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की उप-स्थायी प्रतिनिधि टैमी ब्रूस ने वीजा न देने के फैसले का बचाव करते हुए फिलिस्तीनी पक्ष पर आतंकवाद को पूरी तरह न छोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, "हम इस मांग से पीछे नहीं हटेंगे कि फिलिस्तीनी प्राधिकरण और पीएलओ (फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन) आतंकवाद को पूरी तरह और बिना किसी शर्त के छोड़ें।"
वहीं, इसी दौरान अमेरिका ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची को बैठक में शामिल होने के लिए वीजा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध सातवें महीने में प्रवेश कर चुका है। चीन और रूस ने भी अब्बास को वीजा नहीं देने के लिए अमेरिका की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के मेजबान देश के रूप में अमेरिका की यह जिम्मेदारी थी कि वह उन्हें वीजा दे। सभी पश्चिमी देशों ने भी प्रस्ताव के पक्ष में ही वोट दिया।
फिलिस्तीन का पक्ष और दो-राष्ट्र समाधान
फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र में एक देश के रूप में पूर्ण मान्यता प्राप्त नहीं है और उसे पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) का दर्जा मिला हुआ है। संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन के स्थायी पर्यवेक्षक रियाद मंसूर ने कहा, "हमें वीजा नहीं दिया गया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र के सामने सबसे बड़े मुद्दों में से एक, यानी फिलिस्तीनी लोग और उनका नेतृत्व, यहां मौजूद नहीं हैं।"
उन्होंने अपनी बात दोहराई कि फिलिस्तीन अपने साथ-साथ इज़रायल के भी 'शांति और सुरक्षा' के साथ रहने के अधिकार को मान्यता देता है। मंसूर ने कहा कि जब तक फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर इज़रायल का 'गैरकानूनी कब्जा' खत्म नहीं हो जाता और 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक वे अपनी आवाज उठाते रहेंगे।
इनपुट: IANS



