जैन धर्म कैसे अपनाएं और इसकी दीक्षा विधि
जैन धर्म को अपनाने की दीक्षा विधि के बारे में जानने से पहले जैन धर्म के बारे में जान लेते हैं.जैन धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों में से एक है.
जैन धर्म को अपनाने की दीक्षा विधि के बारे में जानने से पहले जैन धर्म के बारे में जान लेते हैं.जैन धर्म विश्व के प्राचीन धर्मों में से एक है. जिसके प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) तथा अंतिम और प्रमुख तीर्थक महावीर स्वामी हैं. जैन धर्म की प्राचीनता के बारे में हमें इससे संबंधित साहित्य से पता चलता है. जैन धर्म आगे चलकर दो सम्प्रदाय श्वेतांबर और दिगंबर में विभाजित हो गया. ‘जिन’ शब्द संस्कृत के ‘जि’ धातु से बना है. जिसका अर्थ होता है- जीतना. जैन धर्म अर्थात् ‘जिन’ भगवान् का धर्म.

अगर जैन धर्म के सिद्धातों की बात करें तो इसमें सबसे पहले अहिंसा का स्थान आता है. इसका दूसरा महत्तवपूर्ण सिद्धांत कर्म है. जैन धर्म में 5 व्रत होते हैं. अहिंसा , सत्य , अस्तेय ( बिना दी हुई वस्तु का ग्रहण नहीं करना) , ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह (जरूरत से ज्यादा संचित ना करना ).

जैन धर्म अपनाना और इसकी दीक्षा विधि-
संसार के सब मौह-माया को त्याग कर सन्यसी का जीवन जीना कभी कभी आसान लगता है. लेकिन जैन धर्म को अपनाकर संन्यासी का जीवन जीना और इसकी दीक्षा ग्रहण करने के लिए बहुत ही संयम और अनुशासन की जरूरत होती है. जैन धर्म की दीक्षा विधि के समय एक समारोह का आयोजन किया जाता है. जिसमें अच्छे कपड़े पहनकर दीक्षा लेने वाले लोग शामिल होते हैं. जिसके बाद वो श्वेत वस्त्र धारण कर लेते हैं. इसके साथ ही अपने परिवार के साथ उनका रिस्ता वहीं तक का होता है.
यह भी पढ़ें: क्या आप तिलक लगाने के वैज्ञानिक कारण से अवगत है?
जैन धर्म की दीक्षा लेने वालों को अपने सिर पर कैंची या रेजर का प्रयोग नहीं करते. अपने सिर के बालों और दाढ़ी के बालों को उन्हें हाथों से ही नोचना पड़ता है. अपना भोजन वें स्वयं नहीं पकाते हैं ना ही उनके आश्रम में भोजन बनता है. बल्कि घर घर जाकर भोजन के लिए भिक्षा मांगते हैं. यात्रा के लिए जैन मुनि किसी गाढ़ी या साधन का प्रयोग नहीं करते वे पैदल ही यात्रा करते हैं



