कर्नाटक: मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक पर भीड़ के हमले को लेकर हाईकोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी, 'राज्य में अराजकता है'
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक 19 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक पर भीड़ के हमले की घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार और पुलिस की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए हैं। समाचार एजेंसी IANS के…
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक 19 वर्षीय मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक पर भीड़ के हमले की घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार और पुलिस की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए हैं। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने टिप्पणी की, “क्या यह कानून का राज है? इसीलिए मैं रोज कह रहा हूं, राज्य में अराजकता है।”
यह मामला एक पिता द्वारा अपने बेटे के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की याचिका से जुड़ा है। अदालत में जब घटना की तस्वीरें दिखाई गईं, तो जस्टिस नागप्रसन्ना ने कानून-व्यवस्था की स्थिति पर तीखी प्रतिक्रिया दी।
क्या है पूरा मामला?
यह घटना पिछले महीने चामराजनगर जिले के एक गांव में हुई थी। यहाँ एक 19 वर्षीय मानसिक रूप से बीमार लड़के पर डॉ. अंबेडकर की तस्वीर वाले साइनबोर्ड की लाइटिंग को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा था। अदालत में पेश दलीलों के अनुसार, इसके बाद स्थानीय लोगों की भीड़ ने कथित तौर पर लड़के को निर्वस्त्र कर बिजली के खंभे से बांध दिया और उसके साथ मारपीट की। बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंचकर उसे बचाया।
पुलिस की भूमिका पर सवाल
पीड़ित की मानसिक स्थिति ठीक न होने के बावजूद, पुलिस ने उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 299 और 324(4) के तहत मामला दर्ज कर लिया। इससे पहले, उच्च न्यायालय ने पुलिस को निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई बलपूर्वक कार्रवाई न करे।
सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि एक पुलिस अधीक्षक (एसपी) कैमरे पर युवक को देश निकाला देने और हर साल उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की धमकी देते हुए दिखाई दिए। इस पर न्यायाधीश ने पूछा, “एसपी को इस तरह बात करने का कोई हक नहीं है। इस तरह का तुष्टिकरण क्या है?”
लोकतांत्रिक समाज में ऐसी घटनाओं की जगह नहीं
जस्टिस नागप्रसन्ना ने इस तरह की घटनाओं को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अस्वीकार्य बताया। उन्होंने कहा, “दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं होता। डेमोक्रेटिक सिस्टम में ऐसा नहीं होता।” उन्होंने आगे यह भी कहा, “सबसे बुरे राज में भी ये चीजें बहुत पहले बंद हो गई हैं लेकिन इस देश में नहीं।” मामला अभी भी उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
इनपुट: IANS



