RSS प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में कहा- 'विविधता हमारी एकता की सजावट है', अंतर-धार्मिक संवाद पर ज़ोर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने वैश्विक स्तर पर अंतर-धार्मिक सहयोग को बढ़ावा देने की पहलों के लिए अपने संगठन के पूर्ण समर्थन का ऐलान किया है। न्यूयॉर्क में आयोजित 'वन वर्ल्ड, वन…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने वैश्विक स्तर पर अंतर-धार्मिक सहयोग को बढ़ावा देने की पहलों के लिए अपने संगठन के पूर्ण समर्थन का ऐलान किया है। न्यूयॉर्क में आयोजित 'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न धर्म एक ही सत्य तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं और इस विविधता का सम्मान तथा रक्षा की जानी चाहिए।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस कार्यक्रम में 30 देशों के 180 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए। भागवत ने कहा, "विविधता हमारी आंतरिक एकता की सजावट है। इसे स्वीकार करना होगा।" उन्होंने जोर देकर कहा कि आरएसएस पूरी ताकत से ऐसे प्रयासों के साथ है, क्योंकि दोनों की सोच एक ही है।
भारत के मुसलमानों पर RSS का दृष्टिकोण
कार्यक्रम के दौरान, संघ प्रमुख ने भारत में मुसलमानों को लेकर संगठन की सोच पर पूछे गए सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने 2018 में दिल्ली में हुई एक बातचीत का ज़िक्र किया, जहाँ उनसे पूछा गया था कि क्या हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में मुसलमानों को देश से बाहर कर दिया जाएगा।
इस पर भागवत ने अपना जवाब दोहराते हुए कहा, "तब मैंने कहा था- 'नहीं। वह हिंदू नहीं है। अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा।'" उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू होने का अर्थ है यह मानना कि सभी रास्ते एक ही मंजिल तक जाते हैं और हर इंसान की अपनी गरिमा है। भागवत ने यह भी बताया कि 2018 की उस बैठक के बाद से भारत में मुस्लिम और ईसाई समुदायों के साथ संवाद लगातार जारी है।
ज़मीनी स्तर पर संवाद की ज़रूरत
मोहन भागवत ने ज़मीनी स्तर पर लगातार संवाद और सेवा के प्रयासों पर बल दिया, ताकि दुनिया में फैले संघर्ष और अविश्वास के माहौल को बदला जा सके। उन्होंने कहा कि ऐसे संवाद सिर्फ़ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्रांत, ज़िले और ब्लॉक स्तर तक होने चाहिए। उनके मुताबिक, स्थानीय जुड़ाव से अविश्वास दूर होता है।
उन्होंने कहा, "ये चीजें राजनीति से नहीं होतीं। दुख के साथ कहना पड़ रहा है, लेकिन सच यह है कि राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है।" भागवत ने कहा कि समाज के भीतर से ही समाधान निकलता है और जब समाज में कोई मज़बूत जन-सहमति बनती है, तो राजनीतिक नीतियां भी उससे प्रभावित होती हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि लोगों की सोच बदलने में समय लगता है, इसलिए ऐसे प्रयासों में धैर्य की आवश्यकता होगी।
इनपुट: IANS



