बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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सऊदी-तुर्किये के साथ सैन्य समझौता: मध्य पूर्व में पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका पर उठे सवाल

पाकिस्तान कई आंतरिक और सीमावर्ती चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह मध्य पूर्व में अपनी सैन्य भूमिका का विस्तार कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है…

सऊदी-तुर्किये के साथ सैन्य समझौता: मध्य पूर्व में पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका पर उठे सवाल
(फोटो: IANS)

पाकिस्तान कई आंतरिक और सीमावर्ती चुनौतियों से जूझ रहा है, लेकिन इसके बावजूद वह मध्य पूर्व में अपनी सैन्य भूमिका का विस्तार कर रहा है। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है, जिसमें सऊदी अरब और तुर्किये के साथ हुए एक नए रक्षा समझौते पर प्रकाश डाला गया है।

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रिपोर्ट के अनुसार, 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत किसी भी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे सामूहिक सुरक्षा मजबूत करने और क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देने वाला कदम बताया था।

सीमा पर तनाव के बीच नई प्रतिबद्धताएं

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब पाकिस्तान कई मोर्चों पर संघर्ष की स्थिति में है। यूरोपीय समाचार वेबसाइट 'ईयू रिपोर्टर' में प्रकाशित दिमित्रा स्टाइकू के लेख के मुताबिक, सितंबर के अंत में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर हवाई हमले किए। तालिबान से टकराव और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के खतरे ने पश्चिमी सीमा को एक सक्रिय संघर्ष क्षेत्र बना दिया है। वहीं, पूर्वी सीमा पर भारत के साथ भी संबंध तनावपूर्ण हैं और सिंधु जल संधि जैसे विवाद अनसुलझे हैं।

इन चुनौतियों के बावजूद, 5 अक्टूबर को इस्लामाबाद ने मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब में सैन्य बलों की त्वरित तैनाती पर तुर्किये के साथ सहमति जताई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अभियानों में पाकिस्तान का सहयोग अब सिर्फ कूटनीतिक नहीं रहा, बल्कि इसमें सैन्य उपकरण, सलाहकार और अभियान संबंधी सहायता भी शामिल हो गई है। हालांकि, पाकिस्तान ने अभी तक यमन में सीधे तौर पर अपनी सेना भेजने का फैसला नहीं किया है।

संसदीय निगरानी और राष्ट्रीय हित पर चिंता

रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई है कि इन सैन्य प्रतिबद्धताओं पर संसद और निर्वाचित प्रतिनिधियों की निगरानी कितनी प्रभावी है। लेखिका ने 2015 की घटना का जिक्र किया, जब सऊदी अरब ने यमन में सैन्य हस्तक्षेप के लिए पाकिस्तान से मदद मांगी थी। उस वक्त पाकिस्तानी संसद ने देश के भीतर शिया-सुन्नी तनाव बढ़ने और ईरान के साथ संबंध खराब होने की आशंका के चलते संघर्ष में तटस्थ रहने का फैसला किया था।

लेखिका ने सवाल उठाया है कि क्या 2026 में सैन्य प्रतिष्ठान की महत्वाकांक्षाओं को देश के राष्ट्रीय हितों के रूप में पेश किया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि यह स्पष्ट नहीं है कि एक और संघर्ष में शामिल होने से पाकिस्तान के कौन से महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होगी, जबकि सऊदी अरब के पास पाकिस्तानी सैन्य सहयोग लेने के स्पष्ट कारण हो सकते हैं।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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