मुथांगा फायरिंग मामला: 23 साल बाद आया फैसला, पुलिसकर्मी की हत्या में कोई दोषी नहीं, 35 आरोपी बरी
केरल के बहुचर्चित मुथांगा पुलिस फायरिंग मामले में 23 साल से अधिक समय से चल रही कानूनी लड़ाई आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंच गई है। वायनाड की एक अदालत ने शुक्रवार को इस मामले में अपना फैसला सुनाया, जिसमें…
केरल के बहुचर्चित मुथांगा पुलिस फायरिंग मामले में 23 साल से अधिक समय से चल रही कानूनी लड़ाई आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंच गई है। वायनाड की एक अदालत ने शुक्रवार को इस मामले में अपना फैसला सुनाया, जिसमें 35 आरोपियों को बरी कर दिया गया, जबकि 21 अन्य को दंगे और गैर-कानूनी रूप से इकट्ठा होने जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस कॉन्स्टेबल की हत्या के लिए जिम्मेदार मुख्य आरोपी की मुकदमे के दौरान ही मौत हो चुकी है।
यह मामला 19 फरवरी, 2003 का है, जब तत्कालीन ए.के. एंटनी सरकार के कार्यकाल में पुलिस ने एक ऑपरेशन चलाया था। इसका उद्देश्य 'आदिवासी गोत्र महा सभा' (एजीएमएस) के बैनर तले मुथांगा वन्यजीव अभयारण्य की ज़मीन पर कब्ज़ा करके बैठे सैकड़ों आदिवासी परिवारों को हटाना था। सी.के. जानू और एम. गीतानंदन के नेतृत्व में 47 दिनों तक चले इस आंदोलन का अंत हिंसक झड़पों से हुआ था, जिसमें एक पुलिस कॉन्स्टेबल विनोद और एक आदिवासी प्रदर्शनकारी जोगी की जान चली गई थी।
सबूतों के अभाव में बरी हुए आरोपी
वायनाड जिला प्रधान सत्र न्यायालय के न्यायाधीश ए. अय्यूब खान ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या की साजिश और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप साबित करने में विफल रहा। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने आरोप लगाया था कि झड़प के दौरान कॉन्स्टेबल विनोद को बंधक बनाकर एक अस्थायी शेड में मार दिया गया था। एजेंसी ने एम. गीतानंदन समेत कुल 57 लोगों को आरोपी बनाया था।
बचाव पक्ष ने लगातार यह दलील दी थी कि इस कथित हत्या का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था। उनका तर्क था कि घटनास्थल पर मौजूद पत्रकार और अन्य लोग काफी दूर थे और पुलिस की लगातार फायरिंग व ग्रेनेड धमाकों से उठे धुएं के कारण शेड के अंदर की घटना देखना असंभव था। अदालत ने इन दलीलों को मानते हुए सबूतों को अपर्याप्त पाया।
मुख्य आरोपी की हो चुकी है मौत
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केरल सशस्त्र पुलिस की चौथी बटालियन के कॉन्स्टेबल विनोद की हत्या दूसरे आरोपी अशोकन ने की थी। हालांकि, मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही अशोकन की मृत्यु हो गई। चूंकि हत्या के लिए जिम्मेदार एकमात्र आरोपी अब जीवित नहीं है, इसलिए इस मामले में किसी को भी हत्या की सजा नहीं दी जा सकती। बाकी 21 दोषियों को केवल हिंसा और अतिक्रमण से जुड़े अपराधों के लिए सजा सुनाई जाएगी। इस फैसले के साथ ही राज्य के सबसे लंबे समय से लंबित आपराधिक मुकदमों में से एक का न्यायिक समापन हो गया है।
इनपुट: IANS



