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एलिफेंटा द्वीप: 1500 साल पुराने समुद्री व्यापार और जलवायु परिवर्तन के रिश्तों पर बड़ा अध्ययन शुरू

मुंबई के पास स्थित विश्व धरोहर एलिफेंटा द्वीप के समुद्री इतिहास और जलवायु परिवर्तन के साथ उसके संबंधों को समझने के लिए एक बड़ी संयुक्त शोध परियोजना शुरू की गई है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…

एलिफेंटा द्वीप: 1500 साल पुराने समुद्री व्यापार और जलवायु परिवर्तन के रिश्तों पर बड़ा अध्ययन शुरू
(फोटो: IANS)

मुंबई के पास स्थित विश्व धरोहर एलिफेंटा द्वीप के समुद्री इतिहास और जलवायु परिवर्तन के साथ उसके संबंधों को समझने के लिए एक बड़ी संयुक्त शोध परियोजना शुरू की गई है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस पहल में आईआईटी खड़गपुर, मुंबई पोर्ट अथॉरिटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) मिलकर काम कर रहे हैं। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि बीते समय में जलवायु और समुद्र के जलस्तर में हुए बदलावों ने एलिफेंटा और भारत के पश्चिमी तट पर समुद्री व्यापार और मानवीय गतिविधियों को कैसे प्रभावित किया।

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यह अंतर्विषयक परियोजना (interdisciplinary project) उन्नत भू-विज्ञान तकनीकों और पुरातात्विक सबूतों का मेल करेगी। मुंबई पोर्ट अथॉरिटी ने इस महत्वपूर्ण शोध के लिए 1 करोड़ रुपये देने का वादा किया है। इस अध्ययन से पर्यावरण में बदलाव, तटीय भूगोल और प्राचीन बस्तियों के बीच के जटिल संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी मिलने की उम्मीद है।

क्यों अहम है यह शोध?

यह अध्ययन न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है, बल्कि भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देगा। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) का अनुमान है कि 2100 तक वैश्विक समुद्र का जलस्तर 0.4 से 0.8 मीटर तक बढ़ सकता है। भारत के पश्चिमी तट के लिए यह वृद्धि 1 मीटर तक हो सकती है, जिससे मुंबई के निचले इलाकों के साथ-साथ एलिफेंटा द्वीप के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है, जहाँ भगवान शिव को समर्पित 1500 साल पुरानी प्रसिद्ध गुफाएं हैं। यह प्रोजेक्ट शुरुआती ऐतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक (आज से करीब 1500-1000 साल पहले) समुद्री व्यापार पर जलवायु के असर का विश्लेषण करेगा।

पुरातात्विक खोजों से मिले संकेत

हाल ही में ASI के अभिजीत अंबेडकर के नेतृत्व में हुई खुदाई से यह साबित हुआ है कि एलिफेंटा द्वीप सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि लगभग 1500 साल पहले मानवीय गतिविधियों और बड़े समुद्री व्यापार नेटवर्क का एक अहम केंद्र था। पुरातत्वविदों को यहाँ एक 165 वर्ग मीटर बड़ा और आठ मीटर गहरा आयताकार जलाशय मिला है, जो द्वीप पर मीठे पानी के भंडारण की एक उन्नत प्रणाली का सबूत है। इसके अलावा, खुदाई में बड़े भंडारण जार, इंडो-मेडिटेरेनियन एम्फोरा (सुराही) के टुकड़े और मेसोपोटामिया के टॉरपीडो जार भी मिले हैं, जो दूर-दराज के क्षेत्रों के साथ व्यापारिक संबंधों की ओर इशारा करते हैं।

वैज्ञानिक तकनीक और विशेषज्ञ

परियोजना की मुख्य अन्वेषक और आईआईटी खड़गपुर की प्रोफेसर मेलिंडा बेरा ने कहा, "हम आईआईटी खड़गपुर में मौजूद आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल करके पुराने समय के मौसम और समुद्र के जलस्तर का पता लगाना चाहते हैं।" उन्होंने बताया कि द्वीप की भू-आकृति इसे समुद्र के जलस्तर में मामूली बदलावों के प्रति भी बहुत संवेदनशील बनाती है। टीम एलिफेंटा और पश्चिमी तट पर कई जगहों से तलछट के नमूने लेकर रेडियोकार्बन डेटिंग और आइसोटोप विश्लेषण जैसे तरीकों से प्राचीन जलवायु का अध्ययन करेगी।

वहीं, सह-अन्वेषक प्रोफेसर वी. रविकांत के मुताबिक, "हम पुरातत्व से जुड़े मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों और जार का स्ट्रॉन्टियम और नियोडिमियम आइसोटोप के लिए विश्लेषण भी करेंगे, क्योंकि इनसे उन जगहों का सटीक पता लगाया जा सकता है जहां की मिट्टी का इस्तेमाल इन बर्तनों और जार को बनाने में किया गया था।" इस शोध से जुड़े एक अन्य विशेषज्ञ अजय यादव ने कहा कि यह अध्ययन भारत के प्राचीन समुद्री व्यापार को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने के लिए नए रास्ते खोलेगा।

इनपुट: IANS

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News4Social धर्म-संस्कृति डेस्क

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