कर्नाटक: 'वंदे मातरम' गायन पर राज्यपाल और राज्य सरकार आमने-सामने, संवैधानिक चिंताओं पर चेतावनी
कर्नाटक में आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा गायन को केवल पहले दो श्लोकों तक सीमित करने के फैसले पर राज्यपाल थावरचंद गहलो…
कर्नाटक में आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा गायन को केवल पहले दो श्लोकों तक सीमित करने के फैसले पर राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को चार पन्नों का एक पत्र लिखकर इस कदम पर पुनर्विचार करने और केंद्र के प्रोटोकॉल का पालन करने की सलाह दी है।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, राज्यपाल ने चेतावनी दी है कि राज्य सरकार का यह निर्णय संवैधानिक चिंताएं पैदा कर सकता है और यह केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के विरुद्ध है। यह मामला पहले से ही कर्नाटक उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के माध्यम से न्यायिक जांच के दायरे में है, जिससे इस पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।
राज्यपाल की प्रमुख आपत्तियां
अपने पत्र में, राज्यपाल गहलोत ने राज्य सरकार के 8 सितंबर, 2026 के आदेश को वापस लेने का आग्रह किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम को दो छंदों तक सीमित करना भारत सरकार के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है। राज्यपाल के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगीत पर विशिष्ट आदेश जारी किए हैं, जिसमें गायन के लिए एक आधिकारिक संस्करण निर्धारित है, जो राष्ट्रीय प्रोटोकॉल का हिस्सा है और राज्यों के लिए इसका पालन करना अनिवार्य है।
उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकारों को अपने आधिकारिक समारोहों के लिए राष्ट्रगीत का कोई संक्षिप्त संस्करण निर्धारित करने की अनुमति नहीं है। यह मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीक से जुड़े प्रोटोकॉल के पालन का भी है।
कानूनी और संवैधानिक पक्ष
राज्यपाल ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद ने राष्ट्रगीत को कानूनी संरक्षण दिया है। इस संरक्षण के तहत राष्ट्रगीत के गायन को जानबूझकर रोकना या गायन सभा में बाधा डालना दंडनीय है। इसलिए, राज्य की कोई भी कार्यकारी कार्रवाई केंद्रीय वैधानिक ढांचे के अनुरूप होनी चाहिए।
संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए, गहलोत ने संविधान के अनुच्छेद 162, 256 और 257(1) का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन अनुच्छेदों के तहत, राज्य की कार्यकारी शक्ति को संसदीय कानूनों का पालन करना चाहिए और केंद्र की कार्यकारी शक्ति में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
इनपुट: IANS



