शेयर बाज़ार: निवेशकों के लिए SEBI ने क्यों बदला क्लोजिंग प्राइस तय करने का तरीका?
भारतीय शेयर बाज़ार में अब शेयरों का क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए एक नई व्यवस्था लागू की गई है, जिसे क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) कहा जा रहा है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इसे एक…
भारतीय शेयर बाज़ार में अब शेयरों का क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए एक नई व्यवस्था लागू की गई है, जिसे क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) कहा जा रहा है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने इसे एक रणनीतिक बदलाव बताते हुए कहा है कि इससे बाज़ार में एकरूपता आएगी और कीमतों के निर्धारण (प्राइस डिस्कवरी) की प्रक्रिया बेहतर होगी। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू एक्सचेंजों पर एक ही समय में एक ही शेयर के लिए अलग-अलग क्लोजिंग कीमतों की समस्या को खत्म करना है।
समाचार एजेंसी IANS के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, सेबी ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में इस नए फ्रेमवर्क की जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इक्विटी कैश सेगमेंट में क्लोजिंग प्राइस तय करने के तरीके को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के लिए यह 20 मिनट का विशेष क्लोजिंग ऑक्शन सेशन 3 अगस्त, 2026 से चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है। सेबी का कहना है कि यह सभी तरह के निवेशकों को एक निष्पक्ष, समान और पारदर्शी पहुँच प्रदान करेगा।
नई व्यवस्था की ज़रूरत क्यों पड़ी?
सेबी ने बताया कि पुरानी व्यवस्था वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) पर आधारित थी, जिसमें ट्रेडिंग सत्र के आखिरी 30 मिनट के सौदों का औसत निकाला जाता था। इस वजह से अक्सर दिन के कारोबार में कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और अस्थिरता देखी जाती थी। यह समस्या खासकर तब बढ़ जाती थी जब इंडेक्स में कोई बदलाव (रीबैलेंसिंग) होता था, क्योंकि बाज़ार के लिए बड़े संस्थागत प्रवाह को संभालना मुश्किल हो जाता था।
नई CAS प्रणाली इन चुनौतियों से निपटने और न्यूयॉर्क (NYSE), लंदन (LSE) और हॉन्ग कॉन्ग (HKEX) जैसे प्रमुख वैश्विक बाजारों की सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने के लिए लाई गई है।
पैसिव निवेश और वैश्विक इंडेक्स का प्रभाव
सेबी की रिपोर्ट इस बात पर भी प्रकाश डालती है कि भारतीय पूंजी बाज़ार में पैसिव निवेश का चलन तेजी से बढ़ा है। 31 मार्च, 2026 तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के कुल इक्विटी एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) का लगभग 30% और घरेलू म्यूचुअल फंड के इक्विटी AUM का 28% हिस्सा पैसिव फंड्स का हो गया है।
इसके साथ ही, MSCI और FTSE जैसे वैश्विक सूचकांकों में भारतीय शेयरों का वेटेज भी बढ़कर 12% से 30% के बीच हो गया है। इस वजह से क्लोजिंग प्राइस पर सटीक ट्रेड पूरा करने की मांग बढ़ गई थी ताकि ट्रैकिंग एरर को कम किया जा सके।
क्लोजिंग ऑक्शन सेशन कैसे काम करता है?
पुरानी VWAP पद्धति के विपरीत, CAS प्रणाली लिक्विडिटी को एक ही पारदर्शी नीलामी में केंद्रित करती है। सेबी की रिपोर्ट के अनुसार, यह सिस्टम सभी खरीद और बिक्री के ऑर्डरों को एक साथ काम करने की अनुमति देता है, जिससे मांग और आपूर्ति के अधिकतम मिलान के आधार पर एक संतुलन मूल्य बनता है। इस प्रक्रिया से कीमतों में उतार-चढ़ाव कम होता है और ट्रेड पूरा होने की निश्चितता बढ़ती है, जिससे क्लोजिंग प्राइस अधिक स्थिर और भरोसेमंद बनता है।
इनपुट: IANS



