मंगलवार, 4 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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कैंसर का इलाज: कीमोथेरेपी को ज़्यादा असरदार बना सकते हैं आंत के बैक्टीरिया, नई स्टडी में बड़ी खोज

कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी की दवाएं अक्सर अपना पूरा असर नहीं दिखा पातीं, क्योंकि शरीर का लिवर उन्हें ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही साफ़ कर देता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक अनूठा…

कैंसर का इलाज: कीमोथेरेपी को ज़्यादा असरदार बना सकते हैं आंत के बैक्टीरिया, नई स्टडी में बड़ी खोज
(फोटो: IANS)

कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी की दवाएं अक्सर अपना पूरा असर नहीं दिखा पातीं, क्योंकि शरीर का लिवर उन्हें ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही साफ़ कर देता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक अनूठा समाधान खोज निकाला है, जिसका संबंध हमारी आंतों में मौजूद करोड़ों बैक्टीरिया (गट माइक्रोबायोम) से है। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने पाया है कि आंत के बैक्टीरिया में मामूली बदलाव करके कीमोथेरेपी को पहले से कहीं ज़्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है।

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समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह महत्वपूर्ण शोध प्रतिष्ठित जर्नल 'नेचर मैटेरियल्स' में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि कैसे एक सामान्य एंटीबायोटिक का थोड़े समय के लिए इस्तेमाल करके कीमोथेरेपी की दवा को ट्यूमर तक अधिक मात्रा में पहुंचाया जा सकता है, जिससे इलाज के नतीजे बेहतर हो सकते हैं।

कैसे काम करती है यह नई तकनीक?

आधुनिक कैंसर के इलाज में 'नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी' का इस्तेमाल आम है। इसमें दवा के बेहद सूक्ष्म कण सीधे ट्यूमर पर हमला करने के लिए भेजे जाते हैं। हालांकि, लिवर में मौजूद विशेष प्रतिरक्षा कोशिकाएं, जिन्हें 'कुप्फर सेल्स' कहते हैं, इन कणों को खून से बहुत तेज़ी से हटा देती हैं। इस कारण दवा का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि लिवर की इस सक्रियता को हमारी आंत के बैक्टीरिया नियंत्रित करते हैं। ये बैक्टीरिया 'बाइल एसिड' नाम का एक रसायन बनाते हैं, जो लिवर को यह संकेत देता है कि खून को कितनी तेज़ी से साफ़ करना है।

एंटीबायोटिक से बदला इलाज का असर

इस प्रक्रिया को समझने के बाद, वैज्ञानिकों ने चूहों पर किए गए प्रीक्लिनिकल मॉडल में 'मेट्रोनिडाजोल' नाम की एक आम एंटीबायोटिक का कुछ समय के लिए इस्तेमाल किया।

इसके नतीजे चौंकाने वाले थे:

  • एंटीबायोटिक ने कुछ खास बैक्टीरिया की संख्या कम कर दी, जिससे बाइल एसिड का स्तर घट गया।
  • बाइल एसिड कम होने से लिवर की कुप्फर कोशिकाएं कम सक्रिय हो गईं और उन्होंने दवा को खून से हटाना कम कर दिया।
  • इस वजह से कीमोथेरेपी की दवा शरीर में लगभग दोगुने समय तक बनी रही और ज़्यादा मात्रा में ट्यूमर तक पहुंची।

इस प्रयोग का सीधा असर कोलन, ब्रेस्ट, मेलानोमा और पैंक्रियाटिक कैंसर जैसे कई मॉडलों में ट्यूमर की धीमी वृद्धि और मरीज़ों के ज़्यादा समय तक जीवित रहने के रूप में देखा गया।

क्या यह सिर्फ एंटीबायोटिक का असर है?

यह पुष्टि करने के लिए कि यह फायदा सीधे एंटीबायोटिक से नहीं, बल्कि आंत के बैक्टीरिया में हुए बदलाव से हुआ है, वैज्ञानिकों ने फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (FMT) तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने एंटीबायोटिक दिए गए मॉडल के आंत के बैक्टीरिया को दूसरे मॉडल में ट्रांसप्लांट किया। बिना एंटीबायोटिक दिए भी दूसरे मॉडल में वही सकारात्मक परिणाम मिले, जिससे यह साबित हो गया कि असली भूमिका माइक्रोबायोम की ही है।

भविष्य के लिए उम्मीद

फिलहाल यह रिसर्च शुरुआती यानी प्रीक्लिनिकल स्तर पर है और इसे सीधे इंसानों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, शोधकर्ता इस खोज को लेकर उत्साहित हैं क्योंकि यह कैंसर के इलाज की रणनीति को पूरी तरह बदल सकती है। चूँकि मेट्रोनिडाजोल पहले से ही एक स्वीकृत और सुरक्षित दवा है, इसलिए भविष्य में क्लीनिकल ट्रायल के ज़रिए यह पता लगाया जा सकता है कि क्या मरीज़ों को कीमोथेरेपी के साथ इस एंटीबायोटिक की छोटी खुराक देने से इलाज बेहतर हो सकता है।

इनपुट: IANS

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News4Social टेक डेस्क

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