दुर्लभ चुंबकों के निर्माण में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, सरकारी योजना को मिली 20 बोलियाँ
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), पवन चक्कियों (Wind Turbines) और रक्षा प्रणालियों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली चुंबकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिश…
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), पवन चक्कियों (Wind Turbines) और रक्षा प्रणालियों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली चुंबकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिश रंग लाती दिख रही है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, केंद्र सरकार की 'रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट' (REPM) बनाने की योजना के लिए 20 कंपनियों ने बोलियाँ जमा की हैं। यह भारत में इस अहम तकनीक के इकोसिस्टम को स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
ये चुंबक दुनिया के सबसे शक्तिशाली चुंबकों में से हैं और इनका इस्तेमाल हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से लेकर एयरोस्पेस तक में होता है। वर्तमान में भारत इन चुंबकों के लिए आयात पर निर्भर है। इस निर्भरता को कम करने और वैश्विक बाज़ार में भारत की स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से ही यह योजना शुरू की गई है। भारी उद्योग मंत्रालय ने गुरुवार को यह जानकारी दी।
क्या है यह पूरी योजना?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 25 नवंबर 2025 को इस योजना को मंज़ूरी दी थी, जिसके लिए 7,280 करोड़ रुपए का वित्तीय प्रावधान किया गया है। इसका लक्ष्य देश में कुल 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की क्षमता वाले एकीकृत रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट विनिर्माण संयंत्र स्थापित करना है।
मंत्रालय के मुताबिक, इस योजना के तहत कुल क्षमता को एक प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से पाँच लाभार्थियों को आवंटित किया जाएगा, जिसमें प्रत्येक को अधिकतम 1,200 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की क्षमता दी जाएगी।
प्रक्रिया और आगे का रास्ता
भारी उद्योग मंत्रालय ने 15 दिसंबर 2025 को योजना की अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद, प्रस्ताव के लिए अनुरोध (RFP) 20 मार्च 2026 को जारी किया गया और बोलियाँ जमा करने की अंतिम तिथि 12 अगस्त 2026 थी। सभी 20 तकनीकी बोलियाँ 13 अगस्त 2026 को बोलीदाताओं की उपस्थिति में खोली गईं।
यह योजना कुल सात साल की है। इसमें संयंत्र स्थापित करने के लिए दो साल और फिर बने हुए चुंबकों की बिक्री पर प्रोत्साहन देने के लिए पाँच साल की अवधि शामिल है। इस पहल से उम्मीद है कि भारत में कच्चे माल (NdPr ऑक्साइड) से लेकर तैयार मैग्नेट तक की पूरी वैल्यू चेन विकसित होगी, जिससे आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
इनपुट: IANS



