चेचक के टीके की खोज कब और किस वैज्ञानिक ने की थी ?
वर्तमान समय में हमें कई तरह की स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
वर्तमान समय में हमें कई तरह की स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है. जिनमें से काफी का वैज्ञानिकों ने इलाज ढूंढ लिया तथा कुछ का इलाज ढूंढने के लिए प्रयासरत है. इनमें से काफी बीमारियां ऐसी भी हैं, जो वर्तमान समय में तो हमें ज्यादा प्रभावित नहीं करती हैं. लेकिन जब ये पहली बार पहचान में आई तब इनका मानव जाति पर बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा. इसी कारण लोगों के मन में बीमारियों के इतिहास से संबंधित कई तरह के सवाल पैदा होते हैं. इसी तरह का एक सवाल जो आमतौर पर लोगों के मन में आता है कि चेचक के टीके की खोज कब और किस वैज्ञानिक का ने की थी ? अगर आपके मन में भी ऐसा ही सवाल है, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते हैं.

चेचक बीमारी क्या है -
चेचक एक बहुत ही खतरनाक बीमारी है. यह बीमारी विषाणु जनित होती है. कई दशकों तक इस बीमारी का प्रकोप रहा था. अगर हमारे देश में इस बीमारी को बड़ी माता भी कहा जाता है. आमतौर पर आपने अपने बड़ों को कहते हुए भी सुना होगा कि "माता निकल आई". यह एक संक्रामक बीमारी है. यह किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने , छींकने इत्यादी से फैलता है. इसमें हमारे शरीर पर लाल दाने निकले आते हैं. ये लाल दाने पूरे शरीर पर हो जाते हैं. जिसके बाद उनमें खुजली होती है तथा उनमें तरल पदार्थ या फाले हो जाते हैं. यह बहुत ही प्राचीन रोग है तथा आयुर्वेद में भी इसका वर्णन मिलता है.

चेचक के टीके की खोज कब और किस वैज्ञानिक ने की -
चेचक के कारण लाखों की संख्या में लोगों ऩे अपनी जान गंवाई है. अगर इसके टीके की बात करें, तो इसके टीके की खोज 1796 ईं. में की गई थी. इसके टीके की खोज अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने की थी. यह भी एक रोचक जानकारी है कि सबसे पहले चेचक के टीके की खोज की गई थी. उनके इस आविष्कार की वजह से लाखों लोगों की जिंदगी बची है. वरना बड़ी संख्या में लोगों को इस बीमारी की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ती.
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चेचक की बीमारी की वजह से हमें दूसरी भी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं. जैसे कि इसकी वजह से आंख के कॅार्नियां में अल्सर , अंधापन सहित आंख की समस्याएं, हड्डी का संक्रमण इत्यादी. इस बीमारी का सबसे बेहतर उपचार यही है कि जब आरंभ में इसके लक्षण दिखाई दें, तो बिना लापरवाही के तुरंत डॅाक्टर से संपर्क करना चाहिएं. वैज्ञानिक वेरियोला वायरस से संबंधित वैक्सीना वायरस के उपयोग से चेचक के लिए टीका बनाते हैं . हालांकी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस टीके का असर 5 साल तक रहता है और समय के साथ खत्म हो जाता है. चूंकि यह टीका आजीवन सुरक्षा नहीं देता है, इसलिए अगर किसी व्यक्ति को कई साल पहले यह टीका लगाया गया था तो उस व्यक्ति को वेरियोला वायरस फिर से संक्रमित कर सकता है.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. News4social इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें।
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