भारत एक बहुत बड़ा देश है. प्राकृतिक तौर पर यहां विभिन्न तरह का मौसम देखने को मिलता है. भारत में कहीं बाढ़ आती है, तो कहीं ऐसा भी क्षेत्र है, जहां पानी पीने के लिए भी कम पड़ जाता है. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए नदी जोड़ो परियोजना का विचार किया गया था. जिसका उद्देश्य है कि जहाँ नदियां हैं, वहां से सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में पानी पहुँचाया जा सके ताकि वहां भी खेती की जा सके.
भारत के लिए इस परियोजना का बहुत महत्व है क्योंकि भारत में काफी क्षेत्र ऐसा है, जहां सूखा पढता है. लेकिन यह परियोजना सुनने में जितनी आसान लगती है. इसको लागू करने में उतनी ही जटिलताएं भी हैं. इसका सबसे बड़ा कारण राज्यों के बीच जल के बंटवारे को लेकर सहमती ना बन पाना भी है. जिसके कारण यह परियोजना बीच में ही लटकी पड़ी है.
लेकिन अभी इसमें एक बड़ी प्रगति तब देखने को मिली जब पीएम नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना पर हस्ताक्षर किए. इस परियोजना को केन-बेतवा परियोजना का नाम दिया गया है. इस परियोजना की सफलता भारत के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि कही जा सकते है क्योंकि इससे बुंदेलखंड के 13 जिलों को फायदा होगा. इसके साथ ही नदी जोड़ो परियोजना पर फिर से ध्यान दिया जाना भारत में सूखा ग्रस्त जिलों के लिए एक उम्मीद की किरण जरूर जगाएगी.
भारत में नदी जोड़ो का विचार सर्वप्रथम 1858 में एक ब्रिटिश सिंचाई इंजीनियर सर आर्थर थॉमस कॉटन ने दिया था. लेकिन तब से अब तक इस मुद्दे पर कोई खास प्रगति नहीं हुई है. दरअसल, राज्यों के बीच असहमति, केंद्र की दखलंदाज़ी के लिये किसी कानूनी प्रावधान का न होना और पर्यावरणीय चिंता इसकी राह में कुछ बड़ी बाधाएँ बनकर सामने आती रही हैं.
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केन-बेतवा परियोजना के समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अब और इसी तरह के ओर समझौतों की आस जगी है. अगर नदी जोड़ो परियोजना के बीच आने वाली बाधाओं को दूर कर यह योजना पूरे भारत में लागू हो पाती है, तो हम नदियों के उस जल का बेहतर तरीके से प्रयोग कर पाएगें जो समुद्र में जाकर व्यर्थ हो जाता है.

