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ब्रह्म मुहूर्त क्या है और उस में कौन से काम करने चाहिए?

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रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये।

ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर यानि सुबह चार बजे से 5.30 बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। सिख धर्म में इस समय को अमृत वेला कहते हैं। जिसके द्वारा इस समय का महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईवर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है। इस वक्त उठने से शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोडऩे की जरूरत है।

प्रात: तीन से पांच बजे इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। पंडित वैभव जोशी सलाह देते हैं कि इस समय थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना चाहिए। इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते हैं।

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जीवन में चाहते हैं सफलता तो जागना शुरू कर दें इस मुहूर्त में, जानें क्या है महत्व
सुबह चार से साढ़े बजे तक के समय में उठने से शरीर रहता निरोगी और फुर्तीला। शरीर की समय सारणी के हिसाब से रखें अपनी दिनचर्या।

रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये।

ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर यानि सुबह चार बजे से 5.30 बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। सिख धर्म में इस समय को अमृत वेला कहते हैं। जिसके द्वारा इस समय का महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईवर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है। इस वक्त उठने से शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोडऩे की जरूरत है।

जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या

प्रात: तीन से पांच बजे इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। पंडित वैभव जोशी सलाह देते हैं कि इस समय थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना चाहिए। इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते हैं।

जानें शरीर की समय सारणी को

प्रात: पांच से सात बजे

इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रात: जागरण से लेकर सुबह सात बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह सात के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आंतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

प्रात: सात से नौ बजे तक

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इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूंट-घूंट पिये।

प्रात: 11 से 1 बजे तक

इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आसपास मध्याह्न में संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है। इस समय तरल पदार्थ ले सकते हैं। जैसे म_ा पी सकते है। दही खा सकते है।

दोपहर एक से तीन बजे तक

इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आंत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।

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