CBSE की तीन-भाषा नीति: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा — कक्षा 6 के छात्रों को भी राहत क्यों नहीं?
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की संशोधित तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, अदालत ने केंद्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि कक्षा 7…
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की संशोधित तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, अदालत ने केंद्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि कक्षा 7 से 10 तक के छात्रों को दी जा रही राहत कक्षा 6 के विद्यार्थियों को भी क्यों नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि नई भाषा व्यवस्था को अचानक लागू करने से छात्रों और उनके परिवारों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है जिनमें CBSE की नीति को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बोर्ड ने कक्षा 6 से दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया है। इसके चलते दिल्ली-एनसीआर के कई स्कूलों ने शैक्षणिक सत्र के बीच में ही विदेशी भाषाओं की पढ़ाई बंद कर दी और छात्रों को संस्कृत जैसे विकल्प चुनने के लिए कहा, जिससे उनमें मानसिक तनाव और असमंजस की स्थिति पैदा हो गई।
मामला सिर्फ कानूनी नहीं, मानवीय भी: कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, "यह मामला केवल कानूनी मुद्दा नहीं है, बल्कि बच्चों और उनके परिवारों की सुविधा से भी जुड़ा हुआ है।" उन्होंने कहा कि कक्षा 6 के विद्यार्थियों पर अचानक एक नई भाषा थोपना उनके लिए बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है।
जस्टिस बागची ने सुझाव दिया कि छात्रों और अभिभावकों को तैयारी का पर्याप्त समय देने के लिए इस नई व्यवस्था को जनवरी 2027 से लागू करने पर विचार किया जा सकता है। इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को सूचित किया कि वह इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से निर्देश लेकर कोर्ट को अवगत कराएंगी।
संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं पर होगी जांच
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29 के तहत पाठ्यक्रम निर्धारित करने का अधिकार सिर्फ NCERT को है, इसलिए CBSE द्वारा जारी संशोधित पाठ्यक्रम कानूनी अधिकार के बिना लागू किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह आगे चलकर इस मामले से जुड़े संवैधानिक सवालों पर भी विचार करेगा, जिसमें यह तय करना भी शामिल है कि कौन सी भाषा स्वदेशी और कौन सी विदेशी मानी जाएगी। हालांकि, अदालत ने फिलहाल नीति के क्रियान्वयन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अंतिम सुनवाई के दौरान शिक्षकों की उपलब्धता और पाठ्यपुस्तकों जैसे व्यावहारिक पहलुओं की भी जांच की जाएगी।
इनपुट: IANS



