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वीरभद्र संकट में फंसी सोनिया गांधी!

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वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। उनके खिलाफ  आय से अधिक संपत्ति का मामला चल रहा है, वहीं कोटखाई गैंगरेप केस की काली छाया भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही है और बढ़ती उम्र भी उनकी एक समस्या है, साथ ही बेटे का राजनीतिक भविष्य भी संवारना है। ऐसी ही कुछ समस्याओं ने उन्हें अपने राजनीतिक जीवन की आखिरी पारी में बगावत करने को मजबूर कर दिया है। यही वजह है कि अब वीरभद्र सिंह अपनी पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं।

खबर है कि वीरभद्र सिंह 35 विधायकों का समर्थन लेकर शिमला से दिल्ली आए थे। लेकिन यहां आकर उन्हें पता चला कि उनमें से 21 विधायकों ने पार्टी हाई कमान को चिट्ठी लिखकर ये कहा कि प्रदेश में अभी पार्टी अध्यक्ष को बदलने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल वीरभद्र सिंह तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सूक्खू को अध्यक्ष पद से हटवाना चाहते हैं। लेकिन उनकी इस चाल को मात दे दिया उनके ही तथाकथित समर्थक विधायकों ने।

2017 में हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है और इस चुनाव में वीरभद्र चाहते हैं कि पार्टी अध्यक्ष उनके पसंद का हो यही नहीं टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी योजना उनकी मर्जी से तैयार हो। इस चुनाव में वो अपने बेटे को भी टिकट देना चाहते हैं चो कि सूक्खू के अध्यक्ष रहते संभव नहीं है।

इन्हीं बातों को लेकर कई दिनों से दिल्ली में डेरा जमाए हुए हैं वीरभद्र सिंह लेकिन दिक्कत ये है कि अभी ना तो राहुल जी दिल्ली में है और ना ही सोनिया। हालांकि कांग्रेस के थिंकटैंक अहमद पटेल से उनकी मुलाकत हुई है, पर उन्होंने साफ कर दिया है कि प्रदेश के ज्यादतर विधायक चाहते हैं कि सूक्खू ही अध्यक्ष बना रहे। ऐसे में राहुल गांधी के करीबी सुक्खू को हटाना संभव नहीं है। इन्हीं बातों को लेकर वीरभद्र बागी हो गए हैं और उन्होंने पार्टी आलाकमान को साफ-साफ बता दिया है कि अगर पार्टी अध्यक्ष सूक्खू को नहीं हटाया गया तो वो ना तो चुनाव लड़ेंगे और ना ही किसी चुनावी योजना का हिस्सा बनेंगे। लेकिन साथ ही ये भी कहा है कि चुनाव प्रचार में मुझे जहां भेजा जाएगा मैं वहां जाऊंगा। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि मुझे नीचा दिखाने जा रहा है, किसी भी तरह की नियुक्तियों के बारे में मुझसे बिना सलाह के ही फैसले लिए जा रहे हैं। अब देखना ये है कि दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान उनकी बातों से सहमत होकर पार्टी अध्यक्ष बदलते हैं या फिर वीरभद्र जी को दिल्ली से खाली हाथ लौटना पड़ता है।

 

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