मंगलवार, 11 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
टेक्नोलॉजी

प्लास्टिक कचरे से बनेगा 3D प्रिंटिंग का मज़बूत फिलामेंट, NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं को मिला पेटेंट

3D प्रिंटिंग की दुनिया में बढ़ती लागत और प्लास्टिक कचरे की समस्या का एक साथ समाधान मिल सकता है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी मशीन विकसित की है जो प्लास्टिक…

प्लास्टिक कचरे से बनेगा 3D प्रिंटिंग का मज़बूत फिलामेंट, NIT राउरकेला के शोधकर्ताओं को मिला पेटेंट
(फोटो: IANS)

3D प्रिंटिंग की दुनिया में बढ़ती लागत और प्लास्टिक कचरे की समस्या का एक साथ समाधान मिल सकता है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी मशीन विकसित की है जो प्लास्टिक कचरे को 3D प्रिंटर के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले फिलामेंट में बदल सकती है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस आविष्कार के लिए संस्थान को पेटेंट भी मिल गया है और इसे बनाने में सिर्फ़ लगभग 45,000 रुपये का खर्च आया है।

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यह एक्सट्रूडर प्रणाली प्लास्टिक कचरे का पुनर्चक्रण कर उसे 3D प्रिंटिंग के लिए कच्चा माल, यानी फिलामेंट, बनाने में सक्षम है। 3D प्रिंटर ठीक वैसे ही काम करता है जैसे सामान्य प्रिंटर, बस यहाँ स्याही की जगह फिलामेंट का इस्तेमाल होता है। इस फिलामेंट को पिघलाकर परत-दर-परत जमाया जाता है, जिससे कोई भी ठोस वस्तु तैयार की जा सकती है।

सस्ता और ज़्यादा मज़बूत फिलामेंट

इस नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह न केवल नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम करती है, बल्कि पुनर्चक्रित प्लास्टिक में दूसरी सुदृढ़ीकरण सामग्री मिलाकर पहले से ज़्यादा मज़बूत और टिकाऊ फिलामेंट बनाती है। अब तक पुनर्चक्रित प्लास्टिक से फिलामेंट बनाने के प्रयासों में ज़्यादा लागत, मटीरियल की बर्बादी और कमज़ोर गुणवत्ता जैसी चुनौतियाँ थीं, लेकिन NIT राउरकेला की इस तकनीक में इन समस्याओं का समाधान किया गया है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर संध्यारानी बिस्वास ने कहा, "यह तकनीक फिलामेंट उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति है। इससे बेहतर यांत्रिक गुणों वाले पुर्जे बनाए जा सकते हैं। साथ ही पुनर्चक्रित प्लास्टिक के इस्तेमाल से पर्यावरण को भी फायदा होगा।"

अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए उपयोगी

यह प्रणाली एक ऐसी चक्रीय व्यवस्था (circular economy) को बढ़ावा दे सकती है, जहाँ प्लास्टिक कचरे को फेंकने के बजाय उसे मूल्यवान उत्पादों में बदला जा सके। केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर सुजीत सेन के अनुसार, "यह प्रणाली अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक को उपयोगी 3D प्रिंटर फिलामेंट में बदल सकती है।"

इस तकनीक से बने फिलामेंट का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो सकता है, जैसे:

  • मेडिकल: शरीर के मॉडल, मरीज़ के अनुसार कृत्रिम अंग और चिकित्सकीय उपकरण बनाने में।
  • उद्योग: वाहन और विमान उद्योग के लिए विशेष पुर्जे बनाने में।
  • अन्य: ड्रोन के पुर्जे, खिलौने, सजावटी सामान और शोध कार्यों के लिए।

इस महत्वपूर्ण पेटेंट को हासिल करने वालों में प्रोफेसर संध्यारानी बिस्वास, प्रोफेसर सुजीत सेन, जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना शामिल हैं।

इनपुट: IANS

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