शनिवार, 1 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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कोलकाता में तसलीमा नसरीन: दो दशक बाद लौटीं लेखिका की 'घर वापसी' और उपन्यास 'फेरा' की कहानी

करीब दो दशक के लंबे इंतज़ार के बाद, बांग्लादेशी मूल की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन शनिवार को सार्वजनिक रूप से कोलकाता लौटीं। उनकी इस यात्रा को एक भावनात्मक 'घर वापसी' के रूप में देखा जा रहा है, जो उनके…

कोलकाता में तसलीमा नसरीन: दो दशक बाद लौटीं लेखिका की 'घर वापसी' और उपन्यास 'फेरा' की कहानी
(फोटो: IANS)

करीब दो दशक के लंबे इंतज़ार के बाद, बांग्लादेशी मूल की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन शनिवार को सार्वजनिक रूप से कोलकाता लौटीं। उनकी इस यात्रा को एक भावनात्मक 'घर वापसी' के रूप में देखा जा रहा है, जो उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'फेरा' की कहानी से काफी मेल खाती है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों यात्राओं की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद, विस्थापन का दर्द, स्मृतियों की तलाश और अपनेपन की चाहत का भाव दोनों में समान है।

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तसलीमा के लिए कोलकाता सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य और संस्कृति का केंद्र रहा है, जिसे वे हमेशा अपनी 'सिटी ऑफ जॉय' मानती रहीं। हालांकि उनका जन्म यहां नहीं हुआ, लेकिन उन्होंने इसे अपना दूसरा घर बनाया था। 2007 में उन्हें उग्र विरोध प्रदर्शनों के बाद यह शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था, जिसके बाद वे नई दिल्ली में रहने लगीं।

विवाद और निर्वासन का लंबा दौर

तसलीमा नसरीन को कट्टरपंथियों की धमकियों के कारण 1994 में अपना देश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। इसकी वजह उनकी किताब 'लज्जा' थी, जो 1993 में प्रकाशित हुई थी। इसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश के एक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों को दिखाया गया था, जिससे उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। 2004 में उन्होंने कोलकाता को अपना ठिकाना बनाया, लेकिन 2007 में उनकी आत्मकथा 'द्विखंडित' को लेकर हुए विवाद के बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने उन्हें सुरक्षा कारणों से राज्य छोड़ने के लिए कह दिया।

हालांकि उन पर कभी कोई औपचारिक प्रतिबंध नहीं था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी उनके लिए कोलकाता के दरवाजे बंद ही रहे। इस साल मार्च 2025 में पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने राज्यसभा में उन्हें कोलकाता लौटने की अनुमति देने की मांग उठाई थी, जिसके बाद उनकी वापसी की उम्मीद जगी थी।

उपन्यास 'फेरा' और वापसी के मायने

तसलीमा नसरीन की यह वापसी उनके उपन्यास 'फेरा (द रिटर्न)' की नायिका कल्याणी की कहानी की याद दिलाती है। कल्याणी भी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आई एक हिंदू महिला है, जो वर्षों बाद अपने जन्मस्थान लौटती है। उपन्यास की तरह ही, तसलीमा की वापसी भी यह सवाल उठाती है कि क्या यादों में बसे घर को असल में दोबारा पाया जा सकता है? कल्याणी को भी लौटकर एहसास होता है कि समय ने सब कुछ बदल दिया है।

इस यात्रा को उनके निष्कासन के एक प्रतीकात्मक अंत के रूप में देखा जा रहा है। तसलीमा ने इस मौके पर कोलकाता के दरवाजे फिर से खुलने पर आभार व्यक्त किया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि यह स्वागत भविष्य में भी बना रहेगा या नहीं।

इनपुट: IANS

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News4Social धर्म-संस्कृति डेस्क

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