झारखंड की सांस्कृतिक पहचान 'मांदर' को मिली जीआई टैग की मान्यता
झारखंड के लोक जीवन और सांस्कृतिक उत्सवों की धड़कन माने जाने वाले पारंपरिक वाद्ययंत्र 'मांदर' को अब एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान मिल गई है। भारत सरकार की जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे…
झारखंड के लोक जीवन और सांस्कृतिक उत्सवों की धड़कन माने जाने वाले पारंपरिक वाद्ययंत्र 'मांदर' को अब एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान मिल गई है। भारत सरकार की जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे 'मांदर ऑफ झारखंड' के नाम से पंजीकृत किया है, जिससे इसकी कला और विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता मिली है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, जीआई टैग मिलने से झारखंड के पारंपरिक तरीके से बने मांदर को उसकी खास भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ संरक्षित करने में मदद मिलेगी। यह इसे अन्य स्थानों पर बनाए जाने वाले मिलते-जुलते वाद्ययंत्रों से अलग करेगा। मांदर सिर्फ एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि राज्य के करम और सरहुल जैसे पर्व-त्योहारों से लेकर गांवों के अखड़ों तक की सामूहिक चेतना का हिस्सा है।
निर्माण की पारंपरिक कला
झारखंड के मांदर की खासियत इसकी अनूठी निर्माण प्रक्रिया में है। इसका खोल स्थानीय मिट्टी से तैयार किया जाता है, जिसे पकाकर मजबूत बनाया जाता है। इसके दोनों सिरों पर चमड़ा मढ़कर विशेष तरीके से कसा जाता है, जिससे इसकी आवाज़ में एक खास गूंज और झंकार पैदा होती है। बाजार में लोहे या एल्युमिनियम से बने मांदर भी उपलब्ध हैं, लेकिन पारंपरिक मिट्टी के मांदर की बात ही कुछ और है।
मान्यता दिलाने का सफर
मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया साल 2021 में शुरू हुई थी। एनयूएसआरएल, रांची के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने इस प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने जीआई रजिस्ट्री के समक्ष मांदर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टता से जुड़े दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत किए। इस कार्य में गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी और अन्य संस्थाओं का भी सहयोग रहा। डॉ. सिंह ने बताया कि छोटानागपुर क्षेत्र के जनजातीय जीवन में मांदर के महत्व को साबित करने के लिए मानवशास्त्री शरत चंद्र रॉय और तारक चंद्र दास के शोध कार्यों जैसे ऐतिहासिक दस्तावेजों का भी सहारा लिया गया।
कारीगरों के लिए नई उम्मीद
इस आधिकारिक पहचान का सबसे बड़ा लाभ उन पारंपरिक कारीगरों को मिलने की उम्मीद है जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। गुमला जिले के रायडीह प्रखंड का जरजट्टा गांव मांदर बनाने की पारंपरिक कारीगरी के लिए विख्यात है। जीआई टैग से इन कारीगरों के हुनर को संरक्षण मिलेगा और उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाजार की संभावनाएं भी खुलेंगी।
इनपुट: IANS



