तमिलनाडु के 10 खास कृषि उत्पादों को मिलेगी GI टैग की पहचान, सरकार ने शुरू की तैयारी
तमिलनाडु सरकार ने राज्य के 10 चुनिंदा कृषि उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेत (GI) टैग हासिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ये उत्पाद अपने अनूठे गुणों और खास भौगोलिक क्षेत्रों से गहरे जुड़ाव के लिए जाने…
तमिलनाडु सरकार ने राज्य के 10 चुनिंदा कृषि उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेत (GI) टैग हासिल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ये उत्पाद अपने अनूठे गुणों और खास भौगोलिक क्षेत्रों से गहरे जुड़ाव के लिए जाने जाते हैं। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस पहल का मकसद इन पारंपरिक उत्पादों की पहचान को सुरक्षित करना और किसानों को बेहतर बाज़ार मूल्य दिलाना है।
कृषि मंत्री आर. विनोद ने बताया कि सरकार ने जीआई मान्यता के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ तैयार करने, शोध और अन्य प्रक्रियाओं के लिए 30 लाख रुपये की राशि आवंटित की है। जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों के नाम का गलत इस्तेमाल रुकेगा और स्थानीय किसानों के लिए ब्रांडिंग के अवसर मज़बूत होंगे।
किन 10 उत्पादों को मिलेगी नई पहचान?
जीआई पंजीकरण के लिए जिन उत्पादों को चुना गया है, वे हैं:
- कांचीपुरम परिमिளagai (मिर्च)
- नागापट्टिनम से पोय्यूर कथिरी (बैंगन)
- चिदंबरम का काला चना
- करुमदुरई कडुक्कई (हरड़)
- तिरुवैयारु इलाई वाझाई (केले का पत्ता)
- एरायुर करुनाई किलांगु (सूरन)
- कुड्डालोर वेट्टिवर (खस)
- मनाप्पराई बैंगन
- ऊटी लहसुन
- जव्वादु पेई तिल
जीआई टैग क्या होता है? यह एक तरह का लेबल है जो बताता है कि कोई उत्पाद किसी खास भौगोलिक इलाके में पैदा होता है और उसकी विशेष गुणवत्ता या प्रतिष्ठा उसी क्षेत्र की वजह से है।
किसानों के लिए अन्य घोषणाएं
इस पहल के अलावा, मंत्री ने राज्य के सात जिलों में 11.64 करोड़ रुपये की लागत से नौ बीज भंडारण गोदाम बनाने की भी घोषणा की। ये गोदाम तंजावुर, मयिलादुथुराई, पुदुक्कोट्टई, धर्मपुरी, सेलम, तिरुप्पुर और तिरुवरूर जिलों में बनाए जाएंगे। इसका उद्देश्य किसानों से खरीदे गए बीजों की गुणवत्ता, अंकुरण क्षमता और उर्वरता को बनाए रखना है।
साथ ही, कम बारिश से प्रभावित छह जिलों—विरुधुनगर, थूथुकुडी, शिवगंगा, रामनाथपुरम, तेनकासी और तिरुनेलवेली—में मिर्च की खेती को बढ़ावा देने के लिए 60 लाख रुपये के एक प्रायोगिक कार्यक्रम का भी ऐलान किया गया। इसके तहत सिंचाई व्यवस्था के साथ मिर्च की उपयुक्त किस्मों की पहचान की जाएगी ताकि अनियमित मानसून के बावजूद किसान अच्छी पैदावार ले सकें।
इनपुट: IANS



