सेंसेक्स की पहली वीकली एक्सपायरी: नए क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम से बाजार में क्यों बढ़ सकती है हलचल?
शेयर बाजार में हाल ही में लागू हुए क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम (CAS) के बाद गुरुवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के सेंसेक्स डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स की पहली वीकली एक्सपायरी होनी है। समाचार एजेंसी IANS…
शेयर बाजार में हाल ही में लागू हुए क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम (CAS) के बाद गुरुवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के सेंसेक्स डेरिवेटिव्स कॉन्ट्रैक्ट्स की पहली वीकली एक्सपायरी होनी है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, इस नए सिस्टम और BSE के कैश मार्केट में कम तरलता (लिक्विडिटी) के कारण बाजार में बड़े उतार-चढ़ाव की आशंका जताई जा रही है, जिसको लेकर निवेशक और ट्रेडर्स सतर्क नजर आ रहे हैं।
यह चिंता मंगलवार को निफ्टी की एक्सपायरी के अनुभव से और बढ़ गई है। उस दिन क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी में अचानक 150 अंकों से ज्यादा का उछाल आ गया था, जिससे डेरिवेटिव्स बाजार में भारी हलचल मच गई और कई ट्रेडर्स को हैरानी हुई। अब सेंसेक्स को लेकर भी वैसी ही स्थिति बनने की संभावना जताई जा रही है।
कम लिक्विडिटी बनी चिंता की वजह
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि सेंसेक्स को लेकर चिंताएं ज्यादा हैं, क्योंकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की तुलना में BSE के कैश मार्केट में ऑक्शन विंडो के दौरान भागीदारी काफी कम रहती है। कम भागीदारी का मतलब है कि कोई भी बड़ा सौदा फाइनल सेटलमेंट प्राइस पर ज्यादा असर डाल सकता है। जानकारों के अनुसार, इस सिस्टम की सफलता पूरी तरह से बाजार में व्यापक भागीदारी पर निर्भर करती है।
हालांकि, हाल के सत्रों में NSE पर ऑक्शन वॉल्यूम में सुधार देखा गया है, लेकिन सेंसेक्स क्लोजिंग ऑक्शन में भागीदारी अभी भी कम है, जिससे कीमतों में अस्थिरता का जोखिम बना हुआ है।
क्या है क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम (CAS)?
क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम को बाजार बंद होने के समय कीमतों का सही पता लगाने की प्रक्रिया में सुधार के लिए लाया गया था। इस व्यवस्था के तहत, स्टॉक एक्सचेंज एक तय समय (ऑक्शन विंडो) के दौरान खरीदने और बेचने के सभी ऑर्डर जमा करता है। इसके बाद एक सिंगल इक्विलिब्रियम प्राइस तय किया जाता है, जिस पर ज्यादा से ज्यादा सौदे पूरे हो सकें।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कम लिक्विडिटी होने पर सेटलमेंट प्राइस को प्रभावित करना आसान हो सकता है। उनके मुताबिक, अगर ऑक्शन के दौरान सेंसेक्स के कुछ बड़े स्टॉक्स (हेवीवेट) में अचानक बड़ी खरीदारी या बिकवाली होती है, तो इसका क्लोजिंग लेवल पर बड़ा असर पड़ सकता है, जो ऑप्शन सेटलमेंट को भी प्रभावित करेगा।
विशेषज्ञों की मिली-जुली राय
बाजार में इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है। एक तरफ जहां ट्रेडर्स गुरुवार की एक्सपायरी के लिए कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव की आशंका जता रहे हैं, वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि ये चिंताएं बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही हैं। उनका तर्क है कि निफ्टी एक्सपायरी में हुई अस्थिरता को देखते हुए, ट्रेडर्स आक्रामक पोजीशन लेने के बजाय अपना जोखिम कम कर सकते हैं। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर नए सिस्टम से कोई अस्थिरता आती भी है, तो वह अस्थायी होगी, क्योंकि समय के साथ बाजार में भागीदारी बढ़ेगी और कीमतें तय करने की प्रक्रिया बेहतर हो जाएगी।
इनपुट: IANS



