शुक्रवार, 11 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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यूपी के विधायकों की पेंशन और भत्तों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, योगी सरकार को नोटिस जारी

उत्तर प्रदेश के मौजूदा और पूर्व विधायकों को मिलने वाले वेतन, पेंशन और अन्य भत्तों को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश…

यूपी के विधायकों की पेंशन और भत्तों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, योगी सरकार को नोटिस जारी
(फोटो: IANS)

उत्तर प्रदेश के मौजूदा और पूर्व विधायकों को मिलने वाले वेतन, पेंशन और अन्य भत्तों को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और विधानमंडल को नोटिस जारी किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह नोटिस 'लोक प्रहरी' नामक संस्था की याचिका पर जारी किया, जिसमें विधायकों को विशेष सुविधाएं देने वाले कानून के कई प्रावधानों को चुनौती दी गई है।

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इस मामले में सुनवाई के लिए अगली तारीख 9 अक्टूबर तय की गई है। याचिकाकर्ता, 'लोक प्रहरी' के महासचिव एसएन शुक्ला, ने अदालत के समक्ष खुद पेश होकर अपनी दलीलें रखीं। याचिका में मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 को चुनौती दी गई है।

याचिका में किन प्रावधानों पर आपत्ति?

याचिका में विधायकों और विधान परिषद सदस्यों (MLC) को दिए जाने वाले कई लाभों पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, रेलवे कूपन, यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता और सदस्यों को मिलने वाले लोन शामिल हैं। इसके अलावा, पूर्व विधायकों, पूर्व एमएलसी और उनके परिवारों को मिलने वाली पेंशन सुविधाओं को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को केवल सदस्यों के 'वेतन और भत्ते' तय करने का अधिकार देता है, इसमें पेंशन या सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों का कोई उल्लेख नहीं है।

क्या मांग कर रही है 'लोक प्रहरी'?

याचिका में अदालत से कई मांगें की गई हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • पूर्व विधायकों-एमएलसी और उनके जीवनसाथी को दी जा रही पेंशन और पारिवारिक पेंशन पर रोक लगाई जाए।
  • अवैध प्रावधानों के तहत अब तक हुए खर्च की वसूली की जाए।
  • वेतन-भत्तों में बदलाव की सिफारिश के लिए एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका

इससे पहले, 13 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कानून के ये प्रावधान राज्य विधानमंडल के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और किसी भी संवैधानिक सीमा का उल्लंघन नहीं करते हैं। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की पीठ ने कहा था कि अनुच्छेद 195 और सातवीं अनुसूची की सूची II की एंट्री 38 विधानमंडल को ऐसे भत्ते देने का अधिकार देती है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के एक फैसले का भी हवाला दिया था, जिसमें सांसदों के लिए पेंशन को सही ठहराया गया था। अदालत ने यह भी माना था कि पेंशन और भत्तों की राशि तय करना विधायिका का नीतिगत मामला है और अदालतें इसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं, जब तक कि यह पूरी तरह से मनमाना या असंवैधानिक न हो। हाईकोर्ट ने कहा था, "लाभों की राशि तय करना पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।"

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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