पाकिस्तान: सुप्रीम कोर्ट से मिली ज़मानत, चंद घंटों बाद मानवाधिकार वकील फिर गिरफ़्तार
पाकिस्तान में मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और उनके पति हादी अली चट्टा को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद दोबारा गिरफ़्तार कर लिया गया। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट…
पाकिस्तान में मानवाधिकार वकील ईमान ज़ैनब मज़ारी-हाज़िर और उनके पति हादी अली चट्टा को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद दोबारा गिरफ़्तार कर लिया गया। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार को हुई इस गिरफ्तारी के बाद इस्लामाबाद की एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। यह मामला सोशल मीडिया पर की गई एक विवादित पोस्ट से जुड़ा है।
यह घटनाक्रम तब हुआ जब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की एक डिवीज़न बेंच ने सोशल मीडिया पोस्ट मामले में दोनों वकीलों की सज़ा पर रोक लगा दी थी। 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के हवाले से बताया गया है कि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट (IHC) के रवैये पर भी सवाल उठाए। बेंच ने टिप्पणी की कि यह अजीब है कि IHC ने सुप्रीम कोर्ट के 12 मई के एक आदेश का ज़िक्र तो किया, लेकिन उसका पालन नहीं किया।
कानूनी प्रक्रिया और घटनाक्रम
इस मामले की शुरुआत 23 जनवरी को हुई थी जब मज़ारी-हाज़िर और चट्टा को गिरफ्तार कर आतंकवाद-रोधी अदालत (ATC) ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा था। इसके अगले ही दिन, 24 जनवरी को एक ज़िला एवं सत्र न्यायालय ने उन्हें कई आरोपों के तहत 17-17 साल जेल की सज़ा और 36-36 मिलियन पाकिस्तानी रुपए का जुर्माना सुनाया था।
इस सज़ा के खिलाफ दोनों वकीलों ने इस्लामाबाद हाईकोर्ट में अपील की और सज़ा पर रोक लगाने की मांग की। जब IHC में मामला लंबे समय तक लंबित रहा, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 12 मई को सुप्रीम कोर्ट ने IHC को उनकी याचिकाओं पर जल्द फैसला करने का आदेश दिया था, लेकिन चार महीने बाद भी कोई निर्णय नहीं आया।
स्वास्थ्य को लेकर चिंता
इससे पहले 25 अगस्त को पाकिस्तान के ह्यूमन राइट्स काउंसिल (HRC) ने ईमान मज़ारी-हाज़िर के बिगड़ते स्वास्थ्य पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। उनके परिवार ने बताया था कि वह एक हफ्ते से सीने में संक्रमण से जूझ रही थीं और ब्लड टेस्ट में व्हाइट ब्लड सेल की संख्या बढ़ी हुई पाई गई, जो संक्रमण का संकेत है।
परिवार का आरोप था कि टीबी जैसी गंभीर बीमारियों की आशंका को दूर करने के लिए चेस्ट एक्स-रे ज़रूरी था, लेकिन जेल प्रशासन ने यह जांच नहीं करवाई। HRC ने अपने बयान में कहा था कि जेल में किसी व्यक्ति के होने का मतलब यह नहीं है कि उससे स्वास्थ्य का अधिकार छीन लिया जाए। संगठन ने अधिकारियों से ईमान और अन्य सभी महिला कैदियों को तत्काल और बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने की मांग की थी।
इनपुट: IANS



