आने वाले हफ़्ते में इन 4 वैश्विक संकेतों पर रहेगी शेयर बाज़ार की नज़र, तय हो सकती है बाज़ार की दिशा
भारतीय शेयर बाज़ार के लिए अगला हफ़्ता कई वैश्विक घटनाक्रमों से भरा रहने वाला है, जो निवेशकों की धारणा और बाज़ार की चाल को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकते हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…
भारतीय शेयर बाज़ार के लिए अगला हफ़्ता कई वैश्विक घटनाक्रमों से भरा रहने वाला है, जो निवेशकों की धारणा और बाज़ार की चाल को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकते हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से लेकर अमेरिकी रोज़गार के मज़बूत आँकड़ों तक, कई ऐसे कारक हैं जिन पर निवेशकों की पैनी नज़र रहेगी और बाज़ार में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
शुक्रवार को घरेलू बाज़ार बढ़त के साथ बंद तो हुए, लेकिन दिन के दौरान मिली ज़्यादातर तेज़ी आख़िरी घंटों में गँवा दी। सेंसेक्स 362.57 अंक (0.48%) चढ़कर 76,515.43 पर और निफ्टी 24.25 अंक (0.10%) की मामूली बढ़त के साथ 23,897.70 पर बंद हुआ। वहीं, मिडकैप इंडेक्स में 0.25% की गिरावट और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.22% की बढ़त ने बाज़ार में मिले-जुले रुझान का संकेत दिया।
कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतें
बाज़ार के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की क़ीमतें हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस हफ़्ते तेल की क़ीमतों में क़रीब 8% का उछाल आया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति में रुकावट बनी हुई है, जिससे ऊर्जा बाज़ार में अनिश्चितता का माहौल है। इसी को देखते हुए वैश्विक वित्तीय संस्थान सिटी ने भी तीसरी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान 80 डॉलर से बढ़ाकर 86 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि इससे महँगाई, कंपनियों की लागत और चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है।
वैश्विक बॉन्ड यील्ड का दबाव
दुनियाभर के बॉन्ड बाज़ारों में बिकवाली का दौर चल रहा है, जिससे कई देशों में बॉन्ड यील्ड कई सालों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है। तेल की बढ़ती क़ीमतों ने महँगाई की चिंता को और बढ़ा दिया है, जिसके चलते निवेशक मान रहे हैं कि केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति को और सख़्त कर सकते हैं। बढ़ती बॉन्ड यील्ड उभरते बाज़ारों से विदेशी निवेश की निकासी का जोखिम बढ़ाती है और सरकारों के लिए क़र्ज़ लेना भी महँगा कर देती है।
अमेरिकी रोज़गार के आँकड़े और विदेशी निवेशक
हाल ही में आए अमेरिका के रोज़गार आँकड़ों ने भी बाज़ार की चिंता बढ़ाई है। अगस्त में वहाँ उम्मीद से क़रीब तीन गुना ज़्यादा, यानी 1.62 लाख नई नौकरियाँ जुड़ीं। इन मज़बूत आँकड़ों से इस बात की आशंका बढ़ गई है कि अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व ब्याज़ दरों को लेकर सितंबर में सख़्त रुख़ अपना सकता है। इस फ़ैसले का असर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की रणनीति पर पड़ेगा, जो भारतीय बाज़ार के लिए एक अहम पहलू है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में इन्हीं वैश्विक संकेतों से बाज़ार की दिशा तय होगी।
इनपुट: IANS



