यौन उत्पीड़न मामला: निचली अदालत का फैसला पलट, बॉम्बे हाईकोर्ट ने तरुण तेजपाल को ठहराया दोषी
करीब 11 साल पुराने यौन उत्पीड़न के एक चर्चित मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को दोषी करार दिया है। गुरुवार को जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसांदेकर की पीठ ने यह…
करीब 11 साल पुराने यौन उत्पीड़न के एक चर्चित मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को दोषी करार दिया है। गुरुवार को जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसांदेकर की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें गोवा की एक निचली अदालत के 2021 के फैसले को पलट दिया गया। उस फैसले में तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, गोवा सरकार ने मापुसा की सत्र अदालत द्वारा तेजपाल को बरी किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर सुनवाई के बाद यह फैसला आया है। कोर्ट ने तेजपाल को बलात्कार और अन्य संबंधित धाराओं के तहत दोषी पाया है और सज़ा की अवधि पर दोपहर 2:30 बजे फैसला सुनाया जाएगा।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला नवंबर 2013 का है, जब तेजपाल की एक जूनियर महिला सहकर्मी ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। आरोप के मुताबिक, गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान एक लग्जरी होटल की लिफ्ट में तेजपाल ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। शिकायत के बाद गोवा पुलिस ने FIR दर्ज की और उसी महीने उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें नियमित ज़मानत मिली थी।
निचली अदालत से हाईकोर्ट तक
मई 2021 में, मापुसा की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्षमा जोशी ने सबूतों को 'संदेह से परे' साबित न कर पाने के आधार पर तेजपाल को बरी कर दिया था। गोवा सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि निचली अदालत ने सबूतों को ठीक से नहीं परखा और एक अहम ईमेल को भी नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसे तेजपाल ने आरोप लगने के बाद कथित तौर पर माफ़ीनामे के तौर पर भेजा था।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
फैसला आने के बाद तेजपाल के वकील ने सज़ा पर रोक लगाने का अनुरोध किया ताकि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें। वहीं, तेजपाल ने खुद को 'पीड़ित' बताते हुए अदालत से नरमी बरतने की अपील की। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि यौन हिंसा के मामलों में एक कड़ा संदेश जाना ज़रूरी है और जब कोई लड़की 'ना' कहे तो उसका मतलब 'ना' ही होता है।
मामले की जांच अधिकारी सुनीता सावंत ने इस फैसले को उन सभी महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण बताया जो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाती हैं।
इनपुट: IANS



