सोमवार, 7 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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धनबाद: ज़मीन के नीचे 100 साल पुरानी आग, 8 महीने में 45 बार धंसी धरती, दहशत में कोयलांचल

झारखंड के धनबाद कोयलांचल में लोग एक अनजाने डर के साए में जी रहे हैं। यहाँ ज़मीन के नीचे एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी आग सुलग रही है, जिसके कारण धरती बार-बार फट रही है और ज़मीन धंस रही है। समाचार…

धनबाद: ज़मीन के नीचे 100 साल पुरानी आग, 8 महीने में 45 बार धंसी धरती, दहशत में कोयलांचल
(फोटो: IANS)

झारखंड के धनबाद कोयलांचल में लोग एक अनजाने डर के साए में जी रहे हैं। यहाँ ज़मीन के नीचे एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी आग सुलग रही है, जिसके कारण धरती बार-बार फट रही है और ज़मीन धंस रही है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल जनवरी से अब तक भू-धंसान और ज़मीन में गहरे गड्ढे (गोफ) बनने की 45 से ज़्यादा घटनाएँ हो चुकी हैं, जिससे स्थानीय निवासियों की ज़िंदगी हर पल ख़तरे में है।

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यह संकट कोई नया नहीं है, लेकिन हाल के महीनों में, खासकर अगस्त और सितंबर में बारिश के साथ, ये घटनाएँ और भी बढ़ गई हैं। आलम यह है कि झरिया, कतरास, लोदना, केंदुआडीह और बाघमारा जैसे कई इलाकों में लोगों को हर वक्त यह डर सताता है कि अगला हादसा कब और कहाँ हो जाएगा। घर में सो रहे परिवार अचानक धमाके की आवाज़ से जागते हैं और देखते ही देखते उनका घर ज़मीन में समाने लगता है। दीवारों में दरारें, खिसकते फर्श, ज़हरीली गैस और आग की लपटें यहाँ की कड़वी सच्चाई बन गई हैं।

हाल की भयावह घटनाएँ

पिछले कुछ हफ़्तों की घटनाएँ इस संकट की गंभीरता को दर्शाती हैं। 6 अगस्त को कतरास के छाताबाद में हुई घटना सबसे भयावह थी, जब ज़मीन धंसने से 20 से ज़्यादा मकान क्षतिग्रस्त हो गए और कई लोग घायल हो गए। स्थानीय लोगों ने इसके लिए खनन के दौरान होने वाली भारी ब्लास्टिंग को ज़िम्मेदार ठहराया, जिसके बाद प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा, 31 अगस्त से 4 सितंबर के बीच लिलोरी पथरा, गोधर, कतरास, बरारी और कुर्मी डीह में भी ज़मीन धंसने, गोफ बनने और ज़हरीली गैस के रिसाव की कई घटनाएँ सामने आईं।

प्रशासनिक कदम और चुनौतियाँ

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री के सलाहकार तरुण कपूर ने 31 अगस्त और 1 सितंबर को धनबाद का दौरा किया। उन्होंने भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) की गतिविधियों, झरिया की भूमिगत आग और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की। उन्होंने प्रभावित लोगों के सुरक्षित और सम्मानजनक पुनर्वास को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या दशकों के भूमिगत खनन, छोड़ी गई पुरानी खदानों और ज़मीन के भीतर बने खोखले हिस्सों का नतीजा है। मानसून की बारिश स्थिति को और बिगाड़ देती है। BCCL के तकनीकी एवं संचालन निदेशक संजय कुमार सिंह के अनुसार, प्रभावित परिवारों को सुरक्षित आवास देना प्राथमिकता है और संशोधित झरिया मास्टर प्लान के तहत पुनर्वास कार्य में तेज़ी लाई जा रही है। इसके लिए 5,940 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित है। हालांकि, पुनर्वास की धीमी गति एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, और हर नए धमाके के साथ लोगों का डर बढ़ता जा रहा है।

इनपुट: IANS

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News4Social बिहार डेस्क

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