Advertising
Home Top stories बेटे ने निकाला तो रैन बसेरा ने सहारा दिया, आज बच्चों को...
Advertising
<

बेटे ने निकाला तो रैन बसेरा ने सहारा दिया, आज बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहीं – Ludhiana News

4
बेटे ने निकाला तो रैन बसेरा ने सहारा दिया, आज बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहीं – Ludhiana News

बेटे ने निकाला तो रैन बसेरा ने सहारा दिया, आज बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहीं – Ludhiana News

रैन बसेरा में बुजुर्गों को मान-सम्मान मिलता है: संस्था का सारा संचालन दानदाताओं के सहयोग से होता है। इसके लिए संस्था ने एक वॉट्सएप ग्रुप बनाया है, जिसमें रैन बसेरे की जरूरतें शेयर की जाती हैं और लोग अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करते हैं।

.

संस्था के प्रधान बताते हैं कि हर महीने करीब एक लाख रुपये का खर्च आता है, जिसमें भोजन, दवा, कपड़े और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। संस्था का उद्देश्य केवल बुजुर्गों को सहारा देना नहीं, बल्कि उन्हें समाज में दोबारा उनका खोया हुआ मान-सम्मान लौटाना है। संस्था के प्रधान कहते हैं कि ये सिर्फ सेवा नहीं, ये उन टूटे दिलों के लिए उम्मीद और नई शुरुआत है, जिन्हें अपनों ने ठुकरा दिया।

यह रैन बसेरा एक मिसाल है एक ऐसी जगह, जहां अपनों के तिरस्कार से टूटे बुजुर्गों को प्यार, सहारा और दोबारा जीने की वजह मिलती है। हर्षिता बांसल | लुधियाना वक्त के उस मोड़ पर, जब बुजुर्गों को अपनों का साथ और सहारा चाहिए होता है, कई बार वही अपने उन्हें घर से निकाल देते हैं।

लुधियाना के ऐसे बेसहारा बुजुर्गों के लिए साडे बुजुर्ग, साडा मान’ संस्था उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है। संस्था न केवल उन्हें रहने की जगह देती है, बल्कि सम्मान, अपनापन और जिंदगी की नई शुरुआत भी। संस्था के प्रधान बताते हैं कि एक घटना ने उन्हें यह सोचने को मजबूर किया कि ऐसे बुजुर्गों के लिए कुछ ठोस करना चाहिए।

वह एक दिन पार्क में बैठे थे, जब उन्होंने देखा कि एक बुजुर्ग कई दिनों से वहीं रह रहा है। पता चला कि उसके अपने बच्चों ने घर से निकाल दिया था। न पैसा था, न सहारा, न सुविधा। गर्मियों में मच्छरों की मार, सर्दियों में सर्द हवाएं और किसी भी तरह की शौचालय सुविधा तक नहीं।

Advertising

संस्था ने सबसे पहले उन्हें एक मंजा देकर रात गुजारने लायक बनाया, फिर रोजाना खाना पहुंचाया। लेकिन यह समाधान स्थायी नहीं था। संस्था ने देखा कि शहर में ऐसे कई और बुजुर्ग हैं, जो इसी हालात में जी रहे हैं। यहीं से संस्था ने फैसला किया कि इन बुजुर्गों को अस्थायी नहीं, स्थायी छत देनी है।

शुरुआत में पार्क में ही टेंट लगाकर करीब एक साल तक खाना, दवाइयां और जरूरत की सभी चीजें दी गईं। इसके बाद प्रशासन से अपील की गई कि इन्हें स्थायी ठिकाना दिया जाए। सितंबर 2022 में प्रशासन ने इन्हें चीमा चौक स्थित रैन बसेरे में स्थानांतरित कर दिया। फिलहाल यहां 25 बुजुर्ग रह रहे हैं, जिनमें 21 पुरुष और 4 महिलाएं शामिल हैं।

इनमें से कई अपनी दास्तान सुनाते हुए भावुक हो जाते हैं। गीता उप्पल उम्र 53 बताती हैं कि करीब तीन साल पहले उनके बेटे ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था। फेसबुक से संस्था की जानकारी मिली और वह खुद ही रैन बसेरे पहुंच गईं। आज वह यहां के कामों में हाथ बंटाती हैं- खाना बनाती हैं और रैन बसेरे में पढ़ाई करने आने वाले बच्चों को ट्यूशन देती हैं।

बहू के कहने पर बेटा यहां छोड़ गया,: राज कुमार अरोड़ा (उम्र 63) बताते हैं कि उन्हें एक साल पहले उनका बेटा इस रैन बसेरे में छोड़ गया था। वजह यह थी कि बेटे और बहू के बीच झगड़ा होता था और बहू ने अल्टीमेटम दे दिया कि या तो वह पिता को रखे या पत्नी को। बेटे ने पत्नी को चुना और राज कुमार जी को छोड़ दिया।

संस्था का ध्यान सिर्फ छत देने तक सीमित नहीं है। यहां बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन देने की पूरी कोशिश होती है। उन्हें तीन वक्त का खाना, कपड़े, दवाइयां और मनोरंजन की सुविधा दी जाती है। कैरम बोर्ड, लूडो, ताश जैसे गेम्स उपलब्ध हैं, ताकि बुजुर्ग मानसिक रूप से स्वस्थ और व्यस्त रहें।

इसके अलावा समय-समय पर उन्हें धार्मिक स्थलों की यात्रा पर भी ले जाया जाता है, ताकि वे इस चारदीवारी से बाहर निकल सकें और मानसिक सुकून पा सकें। लुधियाना| बुजुर्ग की सेवा करते संस्था के सदस्य। लुधियाना| संस्थान में एक साथ इंजॉय करते सभी बुजुर्ग।

पंजाब की और खबर देखने के लिए यहाँ क्लिक करे – Punjab News

Advertising