पुलिस की नौकरी छोड़ने वालों को राहत,सैलरी रिकवरी पर रोक: सरकार की अपील खारिज, केवल ट्रेनिंग का पैसा वसूलने की छूट – Jodhpur News h3>
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें पुलिस की नौकरी छोड़कर दूसरे विभाग में जाने वाले कर्मचारियों से सैलरी वसूलने की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारी ने जितने समय काम किया है, उसका वेतन उसस
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जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने यह फैसला राज्य सरकार की ओर से दायर तीन अपीलों पर सुनवाई के बाद सुनाया है। राज्य सरकार, डीजीपी और अन्य ने रामेश्वर, भगवती और रविंद्र के मामले में एकल पीठ के आदेश को चुनौती देते हुए ये अपील दायर की थी।
पुलिस की नौकरी छोड़ टीचर बन गए
दरअसल, जैसलमेर निवासी रामेश्वर, जालौर निवासी भगवती और नागौर निवासी रविंद्र पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर थे, लेकिन बाद में वे शिक्षक भर्ती परीक्षा पास कर टीचर बन गए। जब उन्होंने पुलिस सेवा से इस्तीफा दिया, तो विभाग ने उनसे सेवा के दौरान मिले वेतन और ट्रेनिंग खर्च दोनों की रिकवरी की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके खिलाफ उन्होंने एकल पीठ में याचिका दायर की थी।
एकल पीठ ने पुलिस विभाग को केवल वेतन की रिकवरी करने से रोक लगा दी थी, लेकिन ट्रेनिंग खर्च पर कोई राहत नहीं दी थी। राज्य सरकार (गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक) ने एकल पीठ के इस फैसले को चुनौती देते हुए खंडपीठ में अपील दायर की।
वेतन वसूली नहीं, सिर्फ ट्रेनिंग खर्च लौटाना होगा
मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी (कर्मचारियों) के वकील ने तर्क दिया कि उनका मामला 2016 के ‘जगदीश बनाम राजस्थान राज्य’ के फैसले के समान है। वकील ने बताया कि कर्मचारी ने अपनी सेवा के दौरान जो काम किया है, उसका वेतन उसका अधिकार है। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि वेतन वाले हिस्से को लेकर कर्मचारियों को राहत दी गई है और वह उचित है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि नियुक्ति के बाद सरकार ने कर्मचारी की ट्रेनिंग पर जो खर्च किया है, वह पैसा कर्मचारी को नियोक्ता (सरकार) को वापस चुकाना होगा।
जगदीश मामले का दिया हवाला
कोर्ट ने अपने आदेश में 13 दिसंबर 2016 को ‘जगदीश बनाम राजस्थान सरकार’ मामले में दिए गए फैसले को आधार बनाया। कोर्ट ने कहा कि उस फैसले में नियमों और तथ्यों की गहन जांच के बाद यह तय किया गया था कि अगर कोई कर्मचारी बॉन्ड पीरियड पूरा होने से पहले नौकरी छोड़ता है, तो उससे ट्रेनिंग का खर्च तो वसूला जा सकता है, लेकिन उसने जितने दिन नौकरी की है, उस दौरान मिले वेतन की रिकवरी नहीं की जा सकती। यानी, सरकार केवल प्रशिक्षण व्यय की वसूली तक ही सीमित रह सकती है।
सरकार का तर्क और कोर्ट का फैसला
सरकार की ओर से वकील ने दलील दी कि नियमों के अनुसार रिकवरी होनी चाहिए। लेकिन वे इस केस को ‘जगदीश केस’ से अलग साबित करने में विफल रहे। जवाब में, याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि उनका मामला पूरी तरह से ‘जगदीश बनाम राज्य सरकार’ वाले फैसले के समान है, जिसमें कोर्ट ने वेतन की रिकवरी को गलत माना था।
खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि एकल पीठ ने जो आदेश दिया है, वह बिल्कुल सही है। कोर्ट ने ‘जगदीश मामले’ का हवाला देते हुए दोहराया कि कर्मचारी ने जिस अवधि में काम किया है, उसका वेतन उसका अधिकार है, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन, चूंकि पुलिस की ट्रेनिंग विशेष होती है और उस पर सरकार का पैसा खर्च होता है, इसलिए ट्रेनिंग का खर्च कर्मचारी को लौटाना ही होगा।
कोर्ट ने पाया कि कानूनी और तथ्यात्मक स्थिति पहले से तय नजीरों के अनुसार है। इसके चलते कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दायर तीनों अपीलों को खारिज कर दिया।



