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भगवान की मूर्ति का विसर्जन क्यों किया जाता है ?

भारत देश प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था वाला देश रहा है. यहाँ के लोगों के रहन-सहन में काफी विविधता पाई जाती है.

भगवान की मूर्ति का विसर्जन क्यों किया जाता है ?

भारत देश प्राचीन काल से ही धर्म और आस्था वाला देश रहा है. यहाँ के लोगों के रहन-सहन में काफी विविधता पाई जाती है. लेकिन अगर हम आस्था की बात करें, तो उनके पूज्य देवों में काफी समानताएं भी देखने को मिलती हैं. इसके साथ ही भगवान की पूजा करने की अनेंक विधियां होती है. अगर हम सही विधि से पूजा नहीं करते हैं, तो हमें उसका पूरा फल नहीं मिल जाता है. इसी कारण भगवान की पूजा विधि तथा उसके पीछे के कारण से संबंधित लोगों में कई तरह के सवाल होते हैं. इसी तरह का एक सवाल जो आमतौर पर लोगों के मन में होता है कि आखिर भगवान की मूर्ति का विसर्जन क्यों किया जाता है ? आपने भी ऐसा कई बार देखों होगा तथा ऐसा ही सवाल आपके मन में भी पैदा हुआ होगा. अगर आप भी इस सवाल का जवाब जानना चाहते हैं, तो इस पोस्ट में इसी सवाल का जवाब जानते हैं.

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मूर्ति का विसर्जन

भगवान की मूर्ति का विसर्जन क्यों -

किसी भी धार्मिक आस्था के पीछे कई तरह की मान्यताएं होती हैं.अगर भगवान गणेश की मूर्ति के विसर्जन के पीछे की मान्यताओं की बात करें, तो माना जाता है कि महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की थी. लेकिन उसको लिखा भगवान शिव के पुत्र भगवान गणेश ने था. वेदव्यास जी ने लगातार 10 दिनों तक महाभारत की कथा सुनाई तथा उसे ठीक वैसे ही गणेश जी ने लिखा. इसके बाद वेदव्यास जी ने भगवान गणेश जी को छुआ तो उनका तापमान बहुत अधिक बढ़ गया था. इसकी कारण वेदव्यास जी ने जलकुंड में उनको स्नान कराया. जिसके बाद उनका तापमान ठीक हुआ. वहीं से मान्यता है कि भगवान गणेश जी की मुर्ति का विसर्जन किया जाता है.

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मूर्ति का विसर्जन

इसके अलावा कुछ लोगों का मानना है कि जिस तरह इंसान इस धरती पर हमेशा नहीं रहता है. कुछ समय के बाद उसकी मृत्यु हो जाती है तथा उसे अपनी सारी मोह माया यहीं छोड़नी पड़ती है. ठीक उसी तरह भगवान की मूर्ति के विसर्जन की आस्था उस तरह इशारा करती हुई एक आस्था है. जिसके अनुसार जब भगवान जी को भी कुछ समय में बाद अपने मूल अस्तित्व में मिलना पडता है, तो फिर हम तो इंसान हैं. हमें भी इसके लिए तैयार रहना चाहिएं. इसी कारण विसर्जन का अर्थ माना जाता है कि अपने मोह से मुक्ति.

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अगर इतिहास की दृष्टि से देखें, तो बाल गंगाधर तिलक से भी इस प्रथा को जोड़कर देखा जाता है. देश की आजादी के लिए उन्होंने बहुत संघर्ष किया. उनको लगता था कि अगर देश के लोगों को एकजुट करना है , तो उसके लिए आस्था एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. जब तक देशवासी एकजुट नहीं होगें, तब तक हम अंग्रेजों का मुकाबला नहीं कर सकते हैं. इसी कारण उन्होंने महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की शुरूआत करवाई थी. इसके कुछ समय बाद वहां गणेश विसर्जन की भी शुरूआत हो गई. इसके अलावा ऐसा भी कहा जाता है कि हम पंचतत्व से मिलकर बने हुए हैं. जिनमें से एक जल है. जल को नारायण का रूप भी माना जाता है. इसी कारण देवताओं की मूर्तियों को जल में विसर्जित किया जाता है. जिसके बाद माना जाता है कि भगवान अपने मूल रूप में विलिन हो गए हैं.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारी पर आधारित हैं. News4social इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें।

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KJ

Kapil Jakhar

कपिल जाखड़ News4Social के कंटेंट राइटर हैं। वे समसामयिक घटनाक्रम, फ़ीचर और सामान्य ज्ञान से जुड़े विषयों पर लिखते हैं, और जानकारी को सरल व तथ्यपरक भाषा में प्रस्तुत करने पर ज़ोर देते हैं। सभी लेख देखें →

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