क्या है मकर संक्रांति का महत्व

हिन्दू पर्व के निमार्ण के अनुसार, सूर्य मकर राशि में जिस दिन प्रवेश करता है, उसी दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है. यदि सूर्य मकर राशि में सूर्योदय से पूर्व प्रवेश करे, तो मकर संक्रांति पहले दिन ही मनाई जाएगी. मकर सक्रांति होने के बाद 02 घटी के समय तक महापुण्य काल होता है. इस बार मकर सक्रांति 15 जनवरी 2020, दिन बुधवार, रात्रि 02 बजकर 06 मिनट पर लग रही है.

लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व अक्सर लगातार 13 व 14 जनवरी को पड़ते हैं. लेकिन इस बार लोहड़ी 13 जनवरी को पड़ी है और मकर संक्रांति 15 जनवरी को है. हम आपको बताने जा रहें है मकर संक्रांति से जुडे पौराणिक कथा के बारें में, ऐसा कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर में जाकर मिली थी.

इसीलिए मकर संक्रांति के दिन को गंगा स्नान का विशेष महत्व है. इसी दन से मौसम में बदलाव का सूचक भी माना जाता है. आज से वातावरम में कुछ गर्मीयां आनी शुरू हो जाती है. फिर बसंत ऋतु के बाद ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है. कुछ अन्य कथाओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन देवता पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और गंगा स्नान करते हैं. इस वजह से भी गंगा स्नान का महत्व विशेष माना जाता है.

ऐसा कहा जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी भूलाकर उनके घर गए थे. धर्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र नदी में स्नान, दान पूजा आदि करने से व्यक्ति का पुण्य प्रभाव हजार गुना बढ़ जाता है. इस दिन से मलमास खत्म होने के साथ शुभ माह प्रारंभ हो जाता है. इस खास दिन को सुख और समृद्धि का दिन माना जाता है.

मत्स्य पुराण के अनुसार, मकर सक्रांति के दिन सूर्योपासना के साथ यज्ञ, हवन एवं दान को पुण्य फलदायक माना गया है. शिव रहस्य ग्रंथ के अनुसार, मकर सक्रांति के अवसर पर हवन पूजन के साथ खाद्य वस्तुओं में तिल एवं तिल से बनी वस्तुओं का विशेष महत्व बताया गया है.

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मकर संक्रांति का पर्व क्यों मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मकर संक्रांति के शुभ अवसर जो व्यक्ति पवित्र नदी में डुबकी लगाता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। इस दान धर्म का कार्य करने से पुण्यफल की प्राप्ति होती है. जिसके फलस्वरूप सभी तरह के मांगलिक कार्य, यज्ञोपवीत, शादी-विवाह, गृहप्रवेश आदि आरम्भ हो जायेंगे. सूर्य का मकर राशि प्रवेश पृथ्वी वासियों के लिए वरदान की तरह है, क्योंकि सृष्टि के सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर आदि इनके मकर राशि के गोचर के मध्य ‘तीर्थराज प्रयाग’ में एकत्रित होकर गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम तट पर स्नान, जप-तप, और दान-पुण्य कर अपना जीवन धन्य करते हैं.