बुधवार, 26 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
स्वास्थ्य

विदिशा: कुपोषण के खिलाफ एकीकृत जंग, 4 महीनों में 229 बच्चों को मिला नया जीवन

मध्य प्रदेश के विदिशा जिला अस्पताल में गंभीर कुपोषण से जूझ रहे बच्चों के लिए एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिसने पिछले चार महीनों में 229 बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार किया है। समाचार एजेंसी IANS…

विदिशा: कुपोषण के खिलाफ एकीकृत जंग, 4 महीनों में 229 बच्चों को मिला नया जीवन
(फोटो: IANS)

मध्य प्रदेश के विदिशा जिला अस्पताल में गंभीर कुपोषण से जूझ रहे बच्चों के लिए एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिसने पिछले चार महीनों में 229 बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार किया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, 'इंटीग्रेटेड एसएएम मैनेजमेंट' नामक इस व्यवस्था के तहत सिर्फ बच्चों का पोषण ही नहीं, बल्कि उनकी स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का भी व्यापक इलाज किया जा रहा है।

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यह कार्यक्रम सिर्फ अस्पताल में भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि डिस्चार्ज होने के बाद भी बच्चों की सेहत पर लगातार नजर रखी जाती है। जिला अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई तक 203 और इस महीने 26 नए बच्चों को मिलाकर कुल 229 गंभीर रूप से कुपोषित (SAM) बच्चों को भर्ती कर उनका सफलतापूर्वक इलाज किया गया है।

कैसे काम करती है यह प्रणाली?

इस व्यवस्था के तहत, अस्पताल में आने वाले बच्चों का सबसे पहले मूल्यांकन होता है। जिला अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. बृजेंद्र छारी ने बताया कि बच्चे के वजन, लंबाई और बांह की परिधि (MUAC) मापकर यह तय किया जाता है कि वह गंभीर कुपोषण की श्रेणी में है या नहीं। जरूरत के अनुसार, उन्हें पीडियाट्रिक वार्ड या पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (PICU) में भर्ती किया जाता है।

शिशु विभाग के प्रभारी डॉ. प्रमोद मिश्रा के अनुसार, इलाज को कई स्तरों पर जोड़ा गया है। बच्चे की बुखार, दस्त, डिहाइड्रेशन या सांस संबंधी शुरुआती समस्याओं को नियंत्रित करने के बाद उसे पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में शिफ्ट कर दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जब तक बच्चा वार्ड या PICU में रहता है, तब भी उसे विशेष डाइट NRC से ही बनाकर दी जाती है।

पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) की भूमिका

NRC में बच्चों को लगभग 14 दिनों तक विशेष निगरानी में रखा जाता है। यहां 20 बेड की व्यवस्था है और बच्चों को दिन में आठ बार पौष्टिक आहार दिया जाता है। डॉ. छारी ने बताया कि इस दौरान बच्चे के साथ रहने वाले माता-पिता को भी पोषण, स्वच्छता और देखभाल के तरीकों के बारे में जागरूक किया जाता है। उन्हें बताया जाता है कि खाना खिलाने से पहले हाथ धोना, भोजन को ढककर रखना और बच्चों के नाखून काटना क्यों जरूरी है। सरकार की ओर से परिजनों को प्रतिदिन 120 रुपये का वेज कॉम्पन्सेशन (मजदूरी मुआवजा) भी दिया जाता है।

डिस्चार्ज के बाद भी जारी रहती है निगरानी

इस कार्यक्रम की एक बड़ी खूबी इसका मजबूत फॉलो-अप सिस्टम है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी बच्चों को दो महीने तक हर 15 दिन में जांच के लिए बुलाया जाता है। इस दौरान उनके स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति जांची जाती है, दवाएं दी जाती हैं और NRC में तैयार खाद्य पैकेट भी दिए जाते हैं। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि बच्चे का कोई टीका छूट तो नहीं गया है।

डॉ. छारी ने कहा कि नर्सिंग स्टाफ की कमी के बावजूद टीम समन्वय से काम कर रही है और कलेक्टर स्तर से भी कार्यक्रम की नियमित निगरानी हो रही है। स्वास्थ्य विभाग, प्रशासन और परिजनों के इस मिले-जुले प्रयास से अधिकतर बच्चे स्वस्थ होकर घर लौट रहे हैं।

इनपुट: IANS

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News4Social हेल्थ डेस्क

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