बिंदेश्वर पाठक: वह शख़्स जिसने शौचालय को सामाजिक सम्मान और बदलाव का प्रतीक बना दिया
स्वच्छता को मानवीय गरिमा और सामाजिक समानता से जोड़ने वाले बिंदेश्वर पाठक की कहानी सिर्फ़ शौचालय बनाने की नहीं, बल्कि समाज की उस गहरी सोच को बदलने की है जो सदियों से चली आ रही थी। उन्होंने 'सुलभ…
स्वच्छता को मानवीय गरिमा और सामाजिक समानता से जोड़ने वाले बिंदेश्वर पाठक की कहानी सिर्फ़ शौचालय बनाने की नहीं, बल्कि समाज की उस गहरी सोच को बदलने की है जो सदियों से चली आ रही थी। उन्होंने 'सुलभ इंटरनेशनल' के ज़रिए एक ऐसे आंदोलन की नींव रखी, जिसका मक़सद मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को खत्म करना और हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों को सम्मानजनक जीवन देना था। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 अगस्त को जब देश आज़ादी का जश्न मनाता है, उसी दिन इस नायक की सांसें थम गई थीं, जिसने अपना जीवन वंचितों की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया।
बिहार के वैशाली ज़िले में जन्मे पाठक ने समाजशास्त्र की पढ़ाई के बाद जब गांधी शताब्दी समिति के साथ काम करना शुरू किया, तो उनका सामना समाज की एक कड़वी सच्चाई से हुआ। उन्होंने उन लोगों की पीड़ा को करीब से देखा, जिन्हें सिर्फ़ अपने काम की वजह से अछूत माना जाता था और जो बेहद अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे थे।
एक विचार जिसने बदली लाखों की ज़िंदगी
एक बचपन की घटना और बाद में बेतिया में हुआ एक अनुभव, जहाँ एक युवक को 'अछूत' होने के कारण मदद नहीं मिली, उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने तय कर लिया कि वह न सिर्फ़ स्वच्छता के लिए काम करेंगे, बल्कि मैला ढोने वाले समुदाय की गरिमा के लिए भी लड़ेंगे। IANS के मुताबिक, 1968 में उन्होंने सूखे शौचालयों के विकल्प पर काम शुरू किया और दो गड्ढों वाले पोर-फ्लश शौचालय की तकनीक विकसित की। यह एक क्रांतिकारी कदम था, जिसका उद्देश्य मानव मल को हाथ से साफ़ करने की ज़रूरत को ही खत्म कर देना था।
चुनौतियों भरा सफ़र और 'सुलभ' का जन्म
यह रास्ता आसान नहीं था। आर्थिक तंगी के चलते बिंदेश्वर पाठक को अपनी ज़मीन और पत्नी के गहने तक बेचने पड़े। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 1973 में आरा नगरपालिका से मिले महज़ 500 रुपए के एक छोटे से प्रोजेक्ट ने एक बड़े बदलाव की नींव रखी। 1974 में बिहार सरकार ने स्थानीय निकायों को सुलभ की तकनीक अपनाने की सलाह दी और यहीं से 'पे एंड यूज़' यानी भुगतान कर इस्तेमाल करने वाले सार्वजनिक शौचालयों की अवधारणा भी लोकप्रिय हुई।
सिर्फ़ शौचालय नहीं, सम्मान की लड़ाई
बिंदेश्वर पाठक का मिशन शौचालय बनाने से कहीं आगे का था। उन्होंने सफ़ाईकर्मियों के पुनर्वास, उनके बच्चों की शिक्षा और कौशल विकास पर ज़ोर दिया ताकि आने वाली पीढ़ी को इस पेशे से मुक्ति मिल सके। उन्होंने सफ़ाईकर्मियों के मंदिरों में प्रवेश से लेकर समाज में उनके सम्मान के लिए भी लंबा संघर्ष किया। बाद में उन्होंने वृंदावन की एकल नारियों के जीवन में गरिमा लौटाने के लिए भी महत्वपूर्ण काम किया। उनके इन असाधारण प्रयासों के लिए उन्हें 1991 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। आज जब देश में स्वच्छता अभियान एक राष्ट्रीय मुद्दा है, तो बिंदेश्वर पाठक का योगदान और भी प्रासंगिक हो जाता है।
इनपुट: IANS



