WHO की दक्षिण-पूर्व एशिया बैठक: टीबी के खिलाफ लड़ाई होगी तेज, नई वैक्सीन की तैयारी पर ज़ोर
टीबी (तपेदिक) के खिलाफ लड़ाई को और मज़बूत करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों ने मिलकर कई ठोस कदम उठाने का फैसला किया है। बुधवार को हुई एक अहम बैठक में…
टीबी (तपेदिक) के खिलाफ लड़ाई को और मज़बूत करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के सदस्य देशों ने मिलकर कई ठोस कदम उठाने का फैसला किया है। बुधवार को हुई एक अहम बैठक में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि टीबी को खत्म करने के लिए बीमारी की जल्द पहचान, बेहतर इलाज, मरीज़ों के परिवारों को आर्थिक मदद और नई वैक्सीन की तैयारियों को प्राथमिकता दी जाएगी। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला WHO क्षेत्रीय समिति के 79वें सत्र के दौरान लिया गया।
दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में दुनिया की करीब एक-चौथाई आबादी रहती है, लेकिन 2024 में वैश्विक स्तर पर टीबी के कुल नए मामलों में से लगभग 34% मामले यहीं दर्ज हुए। अनुमान है कि इस क्षेत्र में करीब 36.8 लाख नए मरीज़ सामने आए और लगभग 4.33 लाख लोगों की मौत हो गई। इनमें से करीब 1.5 लाख लोगों में मल्टीड्रग-रेजिस्टेंट टीबी (MDR-TB) पाई गई, जो दुनिया के कुल मामलों का 38 प्रतिशत से भी ज़्यादा है।
रणनीति में क्या नया है?
सदस्य देशों ने इस बात पर सहमति जताई है कि मरीज़ों की जल्द और सटीक पहचान के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत किया जाएगा। इसके लिए जोखिम वाले समूहों और वंचित समुदायों के बीच व्यवस्थित जांच अभियान चलाए जाएँगे। साथ ही, WHO द्वारा सुझाई गई मॉलिक्यूलर टेस्ट जैसी आधुनिक जांच तकनीकों और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया जाएगा।
रोकथाम और मरीज़-केंद्रित देखभाल: रणनीति के तहत टीबी के मरीज़ के संपर्क में आए लोगों और उच्च-जोखिम वाले समूहों को बचाव का इलाज दिया जाएगा। मरीज़ों को बेहतर इलाज के साथ-साथ पोषण और सामुदायिक सहायता भी मुहैया कराई जाएगी ताकि वे बिना किसी सामाजिक या आर्थिक बाधा के अपना इलाज पूरा कर सकें।
चुनौतियाँ और प्रगति
WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के प्रभारी अधिकारी डॉ. नीलेश बुद्धा ने कहा, "टीबी का इलाज संभव है और इसे रोका भी जा सकता है, फिर भी हमारे क्षेत्र में हर साल लाखों लोगों की जान इससे चली जाती है और कई परिवार गरीबी में चले जाते हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के साधन मौजूद हैं, बस उन्हें हर जरूरतमंद तक समय पर पहुँचाने की ज़रूरत है।
इस क्षेत्र में 2015 से प्रगति हुई है, जिसमें नए मामलों में 16% और मौतों में 23% की कमी आई है, जो वैश्विक औसत से बेहतर है। हालांकि, ये सुधार 2030 तक टीबी को खत्म करने के लक्ष्य (2015 की तुलना में मामलों में 80% और मौतों में 90% कमी) को हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
आर्थिक बोझ और फंडिंग की कमी
टीबी का आर्थिक बोझ भी एक बड़ी चुनौती है। लगभग 44% टीबी प्रभावित परिवारों को इलाज पर भारी खर्च उठाना पड़ता है। दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) के मामलों में यह आंकड़ा 80% से भी ज़्यादा है। इस समस्या से निपटने के लिए फंडिंग की भारी कमी है। 2024 में क्षेत्र में टीबी के लिए करीब 90 करोड़ डॉलर उपलब्ध थे, जबकि ज़रूरत लगभग 300 करोड़ डॉलर की है। इस अंतर को पाटने के लिए सदस्य देशों ने घरेलू संसाधन जुटाने और उपलब्ध फंड का बेहतर इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया है।
इनपुट: IANS



