शुक्रवार, 11 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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सड़क ही नहीं, रेलवे और शहरी इंफ्रा में भी निजी निवेश लाने के लिए नए मॉडल की जरूरत: विशेषज्ञ

भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को सफल बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि मॉनेटाइजेशन यानी सरकारी संपत्तियों से राजस्व जुटाने की रणनीति सिर्फ सड़कों तक सीमित न रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे, शहरी…

सड़क ही नहीं, रेलवे और शहरी इंफ्रा में भी निजी निवेश लाने के लिए नए मॉडल की जरूरत: विशेषज्ञ
(फोटो: IANS)

भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को सफल बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि मॉनेटाइजेशन यानी सरकारी संपत्तियों से राजस्व जुटाने की रणनीति सिर्फ सड़कों तक सीमित न रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे, शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निजी पूंजी को आकर्षित करने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) और रियायत समझौतों (Concession Frameworks) जैसे नए और बेहतर मॉडल अपनाने होंगे।

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यह बात नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के डायरेक्टर जनरल सुरेश गोयल ने बुधवार को नई दिल्ली में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के वार्षिक इंफ्रास्ट्रक्चर समिट में कही। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, गोयल ने कहा कि भारत इस समय इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में एक रणनीतिक मोड़ पर है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सड़क क्षेत्र की सफलता को अन्य क्षेत्रों में भी दोहराने की चुनौती है।

सड़क क्षेत्र की सफलता से सीख

सुरेश गोयल ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के कंसेशन फ्रेमवर्क का उदाहरण देते हुए समझाया कि यह मॉडल क्यों सफल रहा। उन्होंने कहा, "हाईवे प्रोजेक्ट में सबसे बड़ा जोखिम प्रतिस्पर्धी रूट के आने से रेवेन्यू कम होना है। इसके लिए मौजूदा फ्रेमवर्क में टारगेट रेवेन्यू तय किया जाता है। अगर वास्तविक रेवेन्यू कम रहता है तो कंसेशन अवधि बढ़ा दी जाती है और ज्यादा होने पर अवधि घटा दी जाती है।" गोयल के मुताबिक, इस पारदर्शी मॉडल को वैश्विक निवेशकों ने भी अपनाया, जिससे NHAI की संपत्तियों का मॉनेटाइजेशन आसान हुआ। अब यही सफलता रेलवे और दूसरे क्षेत्रों में दोहराने की ज़रूरत है।

PPP का बढ़ता दायरा और नई चुनौतियां

इसी कार्यक्रम में नीति आयोग के पीपीपी प्रोग्राम डायरेक्टर पार्थ सारथी रेड्डी ने कहा कि PPP का इकोसिस्टम अब हाईवे, बंदरगाह और एविएशन से आगे बढ़कर रेलवे, हेल्थकेयर, सॉलिड वेस्ट और जलमार्ग जैसे नए क्षेत्रों में भी फैल रहा है। उन्होंने कहा, "हर एसेट की विशेषता और रिस्क प्रोफाइल के आधार पर सही पीपीपी मॉडल तय करना होगा।"

वहीं, CII की पीपीपी पर राष्ट्रीय समिति के चेयरमैन विनायक चटर्जी ने इस राह की दो बड़ी रुकावटें गिनाईं। पहली, भरोसेमंद और शुरू करने के लिए तैयार प्रोजेक्ट्स की कमी। उन्होंने बताया, "अगले पांच साल के लिए आज लगभग 45.6 लाख करोड़ रुपए की पाइपलाइन की जरूरत है।" दूसरी बड़ी बाधा निजी क्षेत्र के लिए समान अवसरों की कमी है। उन्होंने इस क्षेत्र में आठ सुधारों का भी सुझाव दिया।

समिट में CII इंफ्रास्ट्रक्चर काउंसिल के चेयरमैन बीवीएन राव ने PPP की एक नई परिभाषा देते हुए कहा, "पिछले तीन दशकों से पीपीपी का मतलब पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप है, लेकिन भविष्य के लिए इसका मतलब दृढ़ता, धैर्य और लगन होना चाहिए।" उन्होंने चेतावनी दी कि प्रोजेक्ट में देरी का मतलब सिर्फ रुकी हुई संपत्ति नहीं, बल्कि रुकी हुई नौकरियां और धीमी प्रगति भी है।

इनपुट: IANS

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