जम्मू कश्मीर में परिसीमन आयोग के गठन पर बवाल

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केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में परिसीमन आयोग के गठन पर बवाल शुरू हो गया. भाजपा और पैंथर्स पार्टी इसे सही कदम बता रही हैं तथा दूसरी पार्टियां इसका विरोध किया है. केंद्रीय चुनाव आयुक्त ने सोमवार को राज्य के प्रस्तावित परिसीमन आयोग का गठन करते हुए सुशील चंद्रा को अपनी तरफ से प्रतिनिधि नियुक्त किया.राजनीतिक पार्टियों ने इस पर अपनी अलग- अलग राय रखनी शुरू कर दी है.
क्या है परिसीमन –
अगर हम बिल्कुल साधारण शब्दों में समझे तो परिसीमन का मतलब होता है कि देश या प्रांत में निर्वाचन की सीमाओं को निर्धारित करना. संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत सरकार हर 10 साल के बाद परिसीमन आयोग का गठन करती हैं. इस संबंध में भारत के राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचना जारी की जाती है. संविधान के 84वें संशोधन के मुताबिक 2026 के बाद जब पहली बार जनगणना होगी और उसके आंकड़े प्रकाशित होगें. तो उसके बाद ही लोकसभा का परिसीमन किया जाएगा. तब तक लोकसभा का परिसीमन 1971 की जनगणना के मुताबिक ही होगा. वहीं राज्यों की विधानसभाओं का परिसीमन 2001 की जनगणना के मुताबिक होगा.


अगस्त, 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो अलग केंद्रशासित राज्य बन गए हैं. विधानसभी केवल जम्मू-कश्मीर में होगी. लद्दाख कोई नहीं होगी. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन कानून 2019 के अनुसार जम्मू-कश्मीर में पहले 107 सीटें थी जो अब 114 हो जाएंगी. जबकि परिसीमन निर्वाचन आयोग की निगरानी में किया जाएगा.

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जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के अनुसार जम्मू कश्मीर विधानसभा में परिसीमन के बाद सात सीटों को बढ़ाया जाएगा।.पीछले साल अगस्त में संसद द्वारा जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम को पारित किया था. उससे पहले ही लद्दाख की 4 सीटों समेत जम्मू कश्मीर विधानसभा में 87 निर्वाचित सदस्यों के अलावा दो नामांकित महिला विधायक होती थीं. तथा गुलाम कश्मीर के कोटे की 24 सीटें खाली रखी गई थी.