भारत में चीनी की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं? जानिए एथेनॉल नहीं, ये हैं असली वजहें
देश में चीनी की हालिया कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर चर्चा गर्म है, जिसमें कई लोग इसके लिए गन्ने से एथेनॉल बनाने की नीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हालांकि, कृषि और चीनी उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है…
देश में चीनी की हालिया कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर चर्चा गर्म है, जिसमें कई लोग इसके लिए गन्ने से एथेनॉल बनाने की नीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हालांकि, कृषि और चीनी उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि यह धारणा सही नहीं है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, कीमतों में तेजी की मुख्य वजह गन्ने के उत्पादन में कमी और उससे चीनी निकलने की दर (रिकवरी) का घटना है, न कि एथेनॉल का उत्पादन।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार उपभोक्ताओं के हितों को प्राथमिकता देते हुए चीनी, एथेनॉल और निर्यात के बीच एक संतुलन बनाकर चलती है और लगातार बाजार की निगरानी करती है। कानपुर स्थित राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (National Sugar Institute) के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने स्पष्ट किया कि एथेनॉल उत्पादन को सीधे तौर पर महंगाई का कारण बताना उचित नहीं है।
उन्होंने आंकड़ों के हवाले से बताया कि भारत में सालाना चीनी की खपत लगभग 280 लाख टन है। इस जरूरत को पूरा करने के बाद ही अतिरिक्त चीनी को निर्यात या एथेनॉल उत्पादन के लिए भेजा जाता है। इस साल करीब 31 लाख टन चीनी के बराबर की मात्रा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हुई और लगभग 7 लाख टन का निर्यात किया गया, जबकि देश में कुल उत्पादन 306 लाख टन रहा है। प्रोफेसर मोहन ने कहा, "सामान्य परिस्थितियों में भारत के पास 50 लाख टन या उससे अधिक का बफर स्टॉक रहता है, ताकि किसी अप्रत्याशित स्थिति में बाजार में आपूर्ति प्रभावित न हो।"
उत्पादन और रिकवरी दर का गणित
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने IANS को बताया कि मौजूदा स्थिति के पीछे गुणवत्तापूर्ण गन्ने के उत्पादन में कमी एक बड़ी वजह है। उन्होंने अलग-अलग राज्यों में गन्ने की फसल के चक्र का अंतर समझाया।
उनके अनुसार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में फसल की अवधि लंबी होने के कारण चीनी की रिकवरी दर काफी बेहतर होती है। महाराष्ट्र में यह दर 13-14% तक पहुंच जाती है, जो देश में सबसे अच्छी है। वहां किसान अक्टूबर-नवंबर में गन्ना लगाते हैं और फसल 13-14 महीने खेत में रहती है। वहीं, तमिलनाडु में फसल की अवधि 18 महीने तक हो सकती है, जिससे वहां प्रति हेक्टेयर उत्पादकता सबसे अधिक है। इसके विपरीत, उत्तर भारत में किसान अप्रैल-मई में बुआई करते हैं और फसल 10-11 महीने में ही कट जाती है, जिससे चीनी संचय कम होता है।
चीनी उद्योग के लिए 'गेम चेंजर' है एथेनॉल
प्रोफेसर मोहन ने एथेनॉल कार्यक्रम को भारतीय चीनी उद्योग के लिए एक "गेम चेंजर" बताया। उन्होंने याद दिलाया कि पहले जब देश में चीनी का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो जाता था, तो बाजार में कीमतें गिर जाती थीं। इससे मिलों को भारी नुकसान होता था और वे किसानों का बकाया चुकाने में असमर्थ हो जाती थीं। अतिरिक्त चीनी का निर्यात हमेशा फायदेमंद नहीं होता था।
ऐसे में, अतिरिक्त चीनी से एथेनॉल बनाने की नीति ने न केवल चीनी उद्योग को आर्थिक स्थिरता दी, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात में कमी और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने में भी मदद की है। सरकार उत्पादन के आंकड़ों की लगातार समीक्षा करती है और उसी के आधार पर तय करती है कि कितनी चीनी एथेनॉल के लिए दी जा सकती है।
इनपुट: IANS



