जानियें, बॉलीवुड के नजरिये से आजादी का नया अंदाज!

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जानियें, बॉलीवुड के नजरिये से आजादी का नया अंदाज!
जानियें, बॉलीवुड के नजरिये से आजादी का नया अंदाज!

भारत को आजादी दिलाने में कई वीर जवानों ने अपने प्राणों की बलि दे दी। आज भारत आजादी के सत्तर साल का जश्न मना रहा है। आजादी से लेकर अब तक हमारे देश में कई सारे बदलाव आये। वक्त के साथ-साथ आजादी का नजरिया भी धीरे-धीरे बदलने लगा। इस बदलाव में बॉलीवुड की दुनिया ने अहम योगदान दिया है।

जी हाँ, भारत अपनी आजादी की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस दौरान भारतीय सिनेमा में भी कई बदलाव आए। सरहदों, लड़ाईयों और बाहरी दुश्मनों से हटकर अब सिनेमा देश के अंदर चल रही समस्याओं पर फोकस कर रहा है। पिछले कुछ सालों में ऐसी कई फिल्में रिलीज हुई हैं। जिन्होंने हमे आजादी के नए मायने सिखाए हैं। ये आजादी कभी अपने समाज से होती तो कभी अपने परिवार से या फिर कभी खुद की बनाई हुई बेड़ियों से। आज आजादी दिवस के मौके पर, हम आपके लिए ऐसी फिल्में लाएं, जिसने आजादी को देखने का एक नया नजरिया दिया है। तो चलिए, जानते है कि इस रेस में कौन-कौन सी फिल्में शामिल है-

रंग दे बसंती (2006)

11 साल पहले रिलीज हुई इस फिल्म ने न सिर्फ सफलता का रिकॉर्ड तोड़ा बल्कि सोशल मैसेज के साथ ही आज के यूथ को सोचने पर भी मजबूर कर दिया। हम कहां जा रहे हैं, हमारी जिंदगी का मकसद क्या है। सरकार और देश को कोसने भर से कुछ नहीं होता है। अगर कोई समस्या है तो उसके लिए लड़ना सीखो और उसका हल निकालो। यह फिल्म देश की जनता को आजादी के मायने सिखाती है।

पिंक (2016)-
लंबे समय बाद कोई ऐसी फिल्म रिलीज हुई जिसने बिना कोई भाषण दिए सीधे लोगों के दिलों पर चोट की। फिल्म कई सवाल खड़े करती है। जैसे-गलती किसी की भी हो, लेकिन इल्जाम हमेशा लड़की पर आता है, हमेशा उसके कैरेक्टर पर ही उंगली उठाई जाती है, उसे ही कहा जाता है कि अपनी इच्छाओं को मारो। ऐसे कई सवाल जो आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं। दरअसल, यह फिल्म समाज के दकियानूसी ख्यालातों पर आधारित है, यह फिल्म समाज को आईना दिखाने वाला है।

स्वदेश (2004)-

फिल्म का मोहन भार्गव उन सारे युवाओं का प्रतीक है जो बेहतर जिंदगी की तलाश में देश छोड़कर पलायन कर रहे हैं। वो रहता तो नासा में है, लेकिन उसकी जड़े भारत में है। जिन्हें वो चाहकर भी खुद से अलग नहीं कर पाता। वो देश की याद दिलाती कावेरी अम्मा को अपने साथ अमेरिका ले जाना चाहता है। ये फिल्म शाहरुख खान के करियर की सबसे शानदार फिल्मों में से एक है। आमतौर पर यह फिल्म स्वदेश के प्रति प्रेम भावना से ओत-प्रोत है।

चक दे इंडिया (2007)-

एक सताया हुआ कोच, एक बेरुखी की शिकार टीम और एक मौका खुद को सही साबित करने का। इंडियन हॉकी टीम के कोच कबीर खान के लिए ये मौका है बदनामी के दाग से बाहर निकलने का तो हॉकी टीम की लड़कियों के पास मौका है उन सभी लोगों को गलत साबित करने का। जो ये कहते है कि लड़कियां लड़कों की बराबरी नहीं कर सकतीं। यह फिल्म भी लड़की-लड़के के बीच किये जाने वाले भेदभाव पर आधारित है।

लगान (2001)-
फिल्म का नायक भुवन भारत उस आम आदमी का प्रतीक है। जिसके पास अंग्रेजो से लड़ने के लिए कोई भी हथियार नहीं है। लेकिन वो अपने आत्मबल के भरोसे ऐसे लड़ाई लड़ता है। जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। जी हां, भुवन के पास सिर्फ एक मौका है जीतने का और ढेर सारे मौके हैं हारने के। मगर फिर भी वो अपनी मिट्टी, अपने लोगों के लिए आखिरी वक्त तक लड़ता है और अपनी कभी न हार मानने वाली जिद की वजह से ही जीतता है। यह फिल्म भी लोगों के मन में देश-प्रेम की भावना को जाग्रत करने के साथ ही प्रेरणादायक भी है।

यही है वो फिल्में जो आजादी को देखने का एक नया नजरिया देती है, इन फिल्मों ने देश के अंदर चल रही तमाम बुराईयों को दिखाया है। यह फिल्में वाकई देश को एक नया नजरिया देती है आजादी के मायने को समझने के लिए।

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