गुरूवार, 3 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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हरियाणा: मृदा स्वास्थ्य कार्ड से बदल रही खेती की तस्वीर, लागत घटी और बढ़ी पैदावार

केंद्र सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना हरियाणा के यमुनानगर में किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण ज़रिया बन गई है, जिससे वे अपनी खेती की लागत को कम कर पा रहे हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…

हरियाणा: मृदा स्वास्थ्य कार्ड से बदल रही खेती की तस्वीर, लागत घटी और बढ़ी पैदावार
(फोटो: IANS)

केंद्र सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना हरियाणा के यमुनानगर में किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण ज़रिया बन गई है, जिससे वे अपनी खेती की लागत को कम कर पा रहे हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना के तहत किसान अपने खेत की मिट्टी की वैज्ञानिक जांच करवाकर यह जान सकते हैं कि उसमें किन पोषक तत्वों की कमी है और कौन से तत्व पर्याप्त मात्रा में हैं। इस जानकारी के आधार पर उन्हें संतुलित मात्रा में खाद और उर्वरकों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है, जिससे न सिर्फ़ अनावश्यक खर्च बचता है, बल्कि ज़मीन की सेहत भी बनी रहती है।

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पिछले साल यमुनानगर जिले में 1,10,158 मिट्टी के नमूनों की जांच की गई और सभी किसानों को उनकी रिपोर्ट यानी मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया गया। जिला कृषि अधिकारी आदित्य डबास ने बताया कि विभाग को हर साल मिट्टी जांच का लक्ष्य मिलता है। किसान खुद भी नमूने लाते हैं और विभागीय कर्मचारी भी खेतों से सैंपल इकट्ठा करते हैं।

मिट्टी की जांच में क्या पता चलता है?

यमुनानगर के जगाधरी स्थित सॉयल टेस्टिंग लैब में एनालिटिकल एसोसिएट योगेश ने बताया कि मिट्टी के 12 प्रमुख मापदंडों की जांच की जाती है। इनमें पीएच (अम्लीय/क्षारीय स्तर), ईसी (नमक की मात्रा), ऑर्गेनिक कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर, बोरॉन, जिंक, मैंगनीज, आयरन और कॉपर जैसे तत्व शामिल हैं।

योगेश के अनुसार, "कई बार मिट्टी में कुछ पोषक तत्व पहले से पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं, ऐसे में किसानों को उन्हें दोबारा डालने की जरूरत नहीं होती। बिना जांच के किसान अनावश्यक रूप से उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे आर्थिक नुकसान के साथ मिट्टी की सेहत भी प्रभावित हो सकती है।" उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि फलों का फटना बोरॉन की कमी और पत्तियों का पीला या लाल होना जिंक की कमी का संकेत हो सकता है, जिसका सटीक पता जांच से ही चलता है।

परंपरागत खेती से अलग वैज्ञानिक सलाह

आदित्य डबास ने इस बात पर जोर दिया कि किसान पारंपरिक रूप से डीएपी, यूरिया और जिंक का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन मिट्टी की वास्तविक जरूरत का पता जांच से ही चलता है। उन्होंने कहा, "लगातार एक ही तरह की फसल लेने और फसल चक्र के कारण मिट्टी में कुछ आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।" यमुनानगर में मुख्य रूप से गेहूं, धान, गन्ना और पॉपलर की खेती होती है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड यह तय करने में मदद करता है कि किस फसल में कौन-सा उर्वरक कितनी मात्रा में डालना है। इसके साथ ही, कृषि और मृदा परीक्षण विभाग द्वारा ब्लॉक स्तर पर जागरूकता शिविर भी लगाए जाते हैं ताकि किसानों को मिट्टी की सेहत बनाए रखने के महत्व के बारे में शिक्षित किया जा सके।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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