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मदन लाल ढींगरा: लंदन में क्रांति की गोली चलाने वाले स्वतंत्रता सेनानी, जिन्हें परिवार ने भी छोड़ दिया था

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन मदन लाल ढींगरा का नाम इसलिए अद्वितीय है क्योंकि उन्होंने विदेशी धरती पर आज़ादी की लड़ाई को अंजाम दिया। समाचार एजेंसी…

मदन लाल ढींगरा: लंदन में क्रांति की गोली चलाने वाले स्वतंत्रता सेनानी, जिन्हें परिवार ने भी छोड़ दिया था
(फोटो: IANS)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन मदन लाल ढींगरा का नाम इसलिए अद्वितीय है क्योंकि उन्होंने विदेशी धरती पर आज़ादी की लड़ाई को अंजाम दिया। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जुलाई 1909 को उन्होंने लंदन में एक ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी थी, जिसके लिए उन्हें 25 साल की उम्र में फांसी दे दी गई।

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17 अगस्त 1909 को उन्हें लंदन की पेंटनविल जेल में फांसी पर चढ़ाया गया। यह तारीख भारतीय इतिहास में उनके बलिदान के लिए अमर है। ढींगरा का यह कदम उस वक्त के क्रांतिकारी आंदोलन के लिए एक बड़ी घटना थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था।

क्रांतिकारी विचारों का उदय और परिवार से दूरी

मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को पंजाब के अमृतसर में एक संपन्न और शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ. दित्ता माल ढींगरा एक सिविल सर्जन थे। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ढींगरा स्वदेशी आंदोलन से बहुत प्रभावित हुए। 1904 में, जब उन्होंने कॉलेज के ब्लेज़र के लिए ब्रिटेन से आयातित कपड़े के आदेश का विरोध किया, तो उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया।

पिता के कहने के बावजूद उन्होंने माफ़ी मांगने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने क्लर्क से लेकर मज़दूर तक कई छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं। 1906 में वे मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लंदन गए, जहाँ वे श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और 'इंडिया हाउस' से जुड़ गए। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उनके पिता ने उन्हें परिवार से बेदखल कर दिया और इसकी घोषणा अखबारों में भी की।

लंदन में हत्याकांड और मुकदमा

1 जुलाई 1909 को ढींगरा ने लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में एक समारोह के दौरान कर्जन वायली पर पांच गोलियां चलाईं, जिनमें से चार निशाने पर लगीं। वायली भारत सचिव का राजनीतिक सहायक था और भारतीय क्रांतिकारियों पर नज़र रखने वाली गुप्त पुलिस का प्रमुख भी। इस घटना में वायली को बचाने की कोशिश कर रहे एक पारसी डॉक्टर, कावस लालकाका की भी ढींगरा की गोलियों से मौत हो गई।

उन्हें मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जुलाई 1909 को ओल्ड बेली कोर्ट में उन पर मुकदमा चला। ढींगरा ने अपनी पैरवी खुद की और ब्रिटिश अदालत को मान्यता देने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने कृत्य को भारत की स्वतंत्रता के लिए एक देशभक्तिपूर्ण कार्य बताया और कहा कि उन्हें इसका कोई पछतावा नहीं है। फांसी के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके शव का हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार भी नहीं करने दिया और उसे दफना दिया।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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