क्या मुसलमानों में भी दहेज प्रथा है?
इस्लाम में दहेज प्रथा तो है ही नहीं; बल्कि इसके एकदम विपरीत वर को अपनी वधू को महेर के रूप में बहुत कुछ धन/संपत्ति/आभूषण देना पड़ता है।
इस्लाम में दहेज प्रथा तो है ही नहीं; बल्कि इसके एकदम विपरीत वर को अपनी वधू को महेर के रूप में बहुत कुछ धन/संपत्ति/आभूषण देना पड़ता है। महेर और क़ाज़ी और गवाहों के समक्ष वधू की सम्मति ये दोनों इस्लामी विवाह की अनिवार्य शर्ते हैं। महेर का निर्धारण करने का अधिकार केवल वधू को होता है और महेर वधू की व्यक्तिगत संपत्ति होती है जो उससे किसी भी परिस्थिति में वापस नहीं ली जा सकती है। इसके अतिरिक्त पत्नी को अपने पिता और पति दोनों की संपत्ति में विरासत का अधिकार भी होता है।
मुसलमानों में वधू को दहेज देने का एक और बड़ा कारण भीहै। वास्तव में इस्लाम पुत्री को पिता की सम्पत्ति में अधिकारी मानता है, यद्यपि यह अधिकारपुत्र से कुछ कम होता है लेकिन आमतौर पर मुस्लिम लड़की विवाह से पूर्व या पश्चातपिता की सम्पत्ति में अपने भाइयों से हिस्सा बांटने नहीं आती। पुत्री द्वारा हिस्सा मांगने कीमिसालें अत्यन्त सीमित संख्या में बड़े जमींदार परिवारों में ही देखने में आती हैं। छोटेकिसानों व अन्य लोगों की पुत्रियों की सोच इस मामले में दूसरी है।

सम्पत्ति में अपने हिस्सेकी कुर्बानी देकर बहन अपने भाइयों से मधुर रिश्ते बनाए रखती है। बदले में भाई भीआमतौर पर सदा उसके ऋणी बने रहते हैं और उसेदान-दहेज देने में कंजूसी नहीं करते। फिर यह भी तर्क है कि पुत्री को दहेज तो पैगम्बर ने भी दिया था, फिर भले ही उसकी मात्राकम ही रही हो। गौरतलब है कि पैगम्बर मुहम्मद ने अपनी पुत्री फातिमा की शादी के अवसरपर गृहस्थी के लिए आवश्यक चन्द वस्तुएं दहेज स्वरूप दी थीं।

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हजरत मुहम्मद द्वारा कियागया कोई भी कार्य मुसलमानों के लिए फर्ज न होते हुए भी फर्ज का दर्जा रखता है औरसुन्नत कह लाता है। इस बाबत मुसलमानों का यह मानना हैकि पैगम्बर द्वारा ऐसा कोई भीकार्य किए जाने का प्रश्न ही नहीं उठता जो इस्लाम के अनुकूल न हो। इसलिए उनके कार्योंको दोहराना जायज व हर सूरत में लाभप्रद है।
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