सोमवार, 3 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
इकोनॉमी

भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में जुलाई में भी मज़बूती, पर गति थोड़ी धीमी पड़ी: HSBC PMI सर्वे

भारत के विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) ने जुलाई महीने में भी अपनी मज़बूती बनाए रखी, लेकिन जून के मुकाबले विकास की रफ्तार में मामूली कमी दर्ज की गई है। सोमवार को जारी HSBC इंडिया…

भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में जुलाई में भी मज़बूती, पर गति थोड़ी धीमी पड़ी: HSBC PMI सर्वे
(फोटो: IANS)

भारत के विनिर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector) ने जुलाई महीने में भी अपनी मज़बूती बनाए रखी, लेकिन जून के मुकाबले विकास की रफ्तार में मामूली कमी दर्ज की गई है। सोमवार को जारी HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के आंकड़ों से यह जानकारी सामने आई है। इस सर्वेक्षण के अनुसार, जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग PMI 53.5 पर रहा, जो लगातार वृद्धि का संकेत है क्योंकि 50 से ऊपर का कोई भी आंकड़ा विस्तार को दर्शाता है।

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समाचार एजेंसी IANS के हवाले से जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि यह आंकड़ा जून के 54.2 से थोड़ा कम है। S&P ग्लोबल द्वारा संकलित आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय निर्माताओं को लगातार मिल रही मांग से फायदा हो रहा है, जिससे नए ऑर्डर और उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो रही है। हालांकि, कुल बिक्री, कच्चे माल की खरीद और रोज़गार जैसे कुछ पैमानों पर वृद्धि की गति धीमी हुई है।

निर्यात और सप्लाई चेन से मिले सकारात्मक संकेत

इस सर्वे में एक बड़ा सकारात्मक पहलू नए निर्यात ऑर्डर (Export Orders) में आई तेज़ वृद्धि रही। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कंपनियों को कनाडा, मिस्र, इंडोनेशिया, केन्या, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से ज़्यादा ऑर्डर मिले। इसके अलावा, भविष्य को लेकर कारोबारी उम्मीदों में भी हल्की रिकवरी देखने को मिली है।

HSBC की चीफ़ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने सप्लाई चेन पर टिप्पणी करते हुए कहा, "जुलाई में आपूर्तिकर्ताओं के डिलीवरी टाइम का इंडेक्स बढ़ा, जो एक अच्छा संकेत है कि सप्लाई चेन में होने वाली देरी कम हो रही है।" हालांकि, उन्होंने मध्य पूर्व में बढ़े तनाव को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यह सुधार कितने समय तक टिकेगा, इस पर नए संदेह पैदा हो गए हैं।

लागत और कीमतों का गणित

सर्वे के मुताबिक, कंपनियों के संचालन का खर्च, खासकर परिवहन लागत, जुलाई में भी बढ़ा। इसके बावजूद, लागत में बढ़ोतरी की कुल दर घटकर पांच महीने के निचले स्तर पर आ गई। इसका असर यह हुआ कि कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में भी मामूली वृद्धि की।

प्रांजुल भंडारी ने बताया, "इनपुट लागत में महंगाई कम हुई, लेकिन आउटपुट कीमतों में महंगाई बढ़ी, जिससे पता चलता है कि कंपनियां अपने मार्जिन को बचाने के लिए एक बार फिर कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं।" उन्होंने यह भी बताया कि कंपनियां संभावित रुकावटों से बचने के लिए कच्चे माल और तैयार माल का स्टॉक (इन्वेंट्री) बढ़ा रही हैं।

इनपुट: IANS

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