अमेरिकी चुनावी सुरक्षा: ट्रंप प्रशासन की चेतावनी, विदेशी साइबर हमलों के निशाने पर वोटर डेटा
अमेरिकी मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी साइबर हमलावरों के लिए एक प्रमुख निशाना बने हुए हैं, जिससे देश की चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार…
अमेरिकी मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी साइबर हमलावरों के लिए एक प्रमुख निशाना बने हुए हैं, जिससे देश की चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में जारी खुफिया आकलनों में इस बात को लेकर आगाह किया है। इन दस्तावेजों में स्पष्ट कहा गया है कि अगर यह संवेदनशील डेटा चोरी होता है, तो इसका दुरुपयोग कई वर्षों तक किया जा सकता है।
इन रिपोर्ट्स को राष्ट्रपति ट्रंप के चुनावी सुरक्षा पर दिए गए संबोधन के बाद सार्वजनिक किया गया। व्हाइट हाउस द्वारा जारी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में अमेरिका के सभी 50 राज्यों के मतदाता पंजीकरण सिस्टम को हैक करने की कोशिशें हुई हैं, जिनमें से कम से कम 20 मामलों में हमलावर सफल भी रहे।
विदेशी ताकतों का मकसद और तरीके
खुफिया आकलनों में मतदाता पंजीकरण डेटाबेस को विदेशी खुफिया एजेंसियों और साइबर हमलावरों के लिए सबसे आकर्षक लक्ष्यों में से एक बताया गया है। उनका मुख्य उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालना और लोगों का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से भरोसा कमज़ोर करना है। रिपोर्ट के अनुसार, चोरी किए गए डेटा का इस्तेमाल डाक मतपत्रों के लिए फ़र्ज़ी आवेदन करने, मतदाता के रिकॉर्ड में बदलाव करने, मतदान केंद्र बदलने या सूची से नाम हटाने जैसे कामों के लिए हो सकता है।
रिपोर्ट में 2016 के बाद हुए कई साइबर हमलों का भी ज़िक्र है। इसमें रूस द्वारा वोटर रजिस्ट्रेशन डेटाबेस की जांच, ईरान द्वारा वोटर जानकारी हासिल करने का प्रयास और चीन की चुनाव से जुड़े नेटवर्क को निशाना बनाने वाली संदिग्ध गतिविधियां शामिल हैं।
प्रशासन की प्रतिक्रिया और सुरक्षा उपाय
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में स्वीकार किया कि इन दस्तावेज़ों से साबित होता है कि अमेरिका को अपनी चुनावी व्यवस्था पर विदेशी साइबर खतरों की जानकारी लंबे समय से थी। उन्होंने बताया कि खुफिया एजेंसियों ने मतदाता पंजीकरण डेटाबेस, इलेक्ट्रॉनिक पोल बुक और आधिकारिक चुनावी वेबसाइटों को सबसे ज़्यादा जोखिम वाले सिस्टम के तौर पर पहचाना है।
इस खतरे से निपटने के लिए, DHS ने राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों को कई सुझाव दिए हैं। इनमें नियमित रूप से ऑफलाइन बैकअप लेना, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल, नेटवर्क की निगरानी और किसी भी हमले से निपटने के लिए एक व्यापक योजना तैयार करना शामिल है। प्रशासन ने प्रभावित राज्यों के राज्यपालों और चुनाव अधिकारियों को इन कमजोरियों के बारे में सूचित करना शुरू कर दिया है और अगले साल होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले इन्हें दूर करने का लक्ष्य रखा है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो कि इन साइबर हमलों ने किसी भी राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम बदला हो। इसके बावजूद, विदेशी देशों की बढ़ती साइबर क्षमताओं को देखते हुए मतदाता डेटाबेस की सुरक्षा को अब राष्ट्रीय सुरक्षा की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल कर लिया गया है।
इनपुट: IANS



